प्राणीजगत में हरेक नस्ल की अनुवांशिक क्षमता उसके बीजों या अंडाणु तथा शुक्राणु में निहित और समाहित होता है। इसे जीन्स यानी वंशानुगत जैविक गुणधर्म भी कहते हैं। वनस्पति जगत में पाये जाने हरेक बीज में एक अनाज की तरह इस्तेमाल होने का गुण तो होता है, लेकिन अनाज के हरेक दाने में एक योग्य बीज बनने की ख़ूबियाँ नहीं हो सकतीं। लिहाज़ा, खेती-बाड़ी के संसार में ऐसे बीजों की अहमियत सर्वोपरि होती है जिनमें अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर अगली फ़सल की बुनियाद तैयार करने की क्षमता हो।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कृषि वैज्ञानिकों की ओर से उन्नत और गुणवत्तापूर्ण बीजों के सतत सम्वर्धन, उत्पादन और संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। गुणवत्तापूर्ण बीजों की अनुवांशिक और भौतिक शुद्धता का हर हाल में सन्देह से परे होना अनिवार्य है। अच्छे गुणवत्तायुक्त बीजों का शुद्ध, स्वस्थ, सुडौल, बड़ा या एक जैसे आकार का होना ज़रूरी है क्योंकि ऐसे गुणों वाले बीजों की अंकुरण क्षमता अच्छी होती है।

बीज-फ़सल की खेती का महत्व
फ़सल उत्पादन में गुणवत्तायुक्त बीजों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। आमतौर पर खेती की कुल लागत में उन्नत किस्म के बीजों पर होने वाले ख़र्च की हिस्सेदारी महज 2 से 5 प्रतिशत ही होती है। लेकिन यदि बीजों की गुणवत्ता उत्तम कोटि की हो तो साधारण बीजों के मुक़ाबले पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हासिल हो सकता है। इसीलिए किसानों को हमेशा ‘सही वक़्त पर उन्नत किस्म के बीजों के इस्तेमाल’ का मशविरा ज़रूर दिया जाता है।
कई बार उचित समय पर उन्नत किस्म के बीजों का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना एक चुनौती बन जाता है। इसीलिए उन्नत खेती से जुड़े प्रगतिशील किसानों से ये अपेक्षा होती है कि वो ख़ुद को बीज-फ़सल की खेती से अवश्य जोड़ें, क्योंकि ऐसा करके वो ना सिर्फ़ अपने लिए उत्तम किस्म के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं, बल्कि अपने आसपास के किसानों और प्रमाणिक बीज उत्पादक संस्थाओं को बीज-फ़सल की उपज बेचकर बढ़िया कमाई कर सकते हैं।
किसी भी फ़सल, फल-सब्जी वग़ैरह की सामान्य पैदावार के मुक़ाबले उसके उत्तम किस्म के प्रमाणिक बीजों का बाज़ार भाव काफ़ी ज़्यादा होता है। लेकिन कोई भी किसान औरों के लिए प्रमाणिक बीजों का उत्पादक नहीं बन सकता। कृषि वैज्ञानिकों ने ‘प्रमाणिक बीज-फ़सल उत्पादक’ बनने के लिए ख़ास प्रक्रिया और नियम तय कर रखे हैं। इसके तहत ही राज्यों की बीज प्रमाणीकरण एजेंसियाँ बीजों के पंजीयन की कार्यवाही करती हैं।

बीज-फ़सल के लिए पंजीकरण
बीज-फ़सल के प्रमाणीकरण के लिए इसके उत्पादक किसानों को सम्बन्धित बीज प्रमाणीकरण एजेंसी को निर्धारित ढंग से आवेदन देना पड़ता है। बीज उत्पादन के लिए लगायी गयी बीज-फ़सल की बुआई के एक सप्ताह के बाद या प्रमाणीकरण संस्था की ओर से फ़सल सत्र के लिए निर्धारित अन्तिम तिथि तक आवेदन करना अनिवार्य होता है। फिर बीज प्रमाणीकरण एजेंसी की ओर से उपयुक्त निरीक्षण करने के बाद किसान, फ़सल और खेत के ब्यौरे के साथ पंजीयन की कार्यवाही पूरी की जाती है।
प्रथम निरीक्षण के समय ही बीज से सम्बन्धित रसीद, थैले पर लिखी आवश्यक जानकारियाँ तथा टैग के आधार पर बीज के स्रोत का सत्यापन किया जाता है। ये सुनिश्चित किया है कि पंजीकृत किसान के पास अपने फ़सल की कृषि क्रियाओं से जुड़ी सभी अपेक्षित जानकारियाँ मौजूद हैं। यदि इसमें मामूली कसर रहती है तो किसानों को कृषि विशेषज्ञ समुचित मार्गदर्शन देकर ज़रूरी सावधानियों के बारे में बताते हैं।
बीजों की पाँच श्रेणियाँ
बीजों के किस्मों को कृषि वैज्ञानिक मुख्य रूप पाँच श्रेणियों में बाँटते हैं – नाभिकीय बीज, प्रजनक बीज, आधार बीज, प्रमाणित बीज और सत्यापित बीज। लेकिन नाभिकीय और प्रजनक बीजों का इस्तेमाल पूरी तरह से उच्चस्तरीय कृषि शोध संस्थाओं या जीन्स बैंक वग़ैरह में ही होता है। आम किसानों से इसका कोई वास्ता नहीं पड़ता। अलबत्ता, आधार और प्रमाणित श्रेणी के बीजों के प्रमाणीकरण के लिए उनका सम्बन्धित केन्द्रीय या प्रादेशिक किस्म विमोचन समिति की ओर से विमोचित और अधिसूचित होना अनिवार्य है।
आधार बीजों को सफ़ेद टैग
आधार बीजों के उत्पादन लिए प्रजनक बीजों का इस्तेमाल किया जाता है। इस श्रेणी वाले बीज का उत्पादन मुख्यत: कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि महाविद्यालयों, कृषि अनुसन्धान संस्थानों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, राजकीय कृषि विभाग के खेतों, बीज निगम के खेतों तथा पूर्ण रूपेण प्रशिक्षित किसानों के खेतों में किया जाता है। यह बीज शत-प्रतिशत शुद्ध होता है। बीज के लिए लगायी गयी फ़सल के खेतों का निरीक्षण सम्बन्धित कृषि अधिकारी करते हैं। उत्पादित आधार बीज के थैलों में लगाने के लिए उत्पादक संस्थाओं और किसानों को सफ़ेद रंग का टैग दिया जाता है।

प्रमाणित बीजों को नीला टैग
प्रमाणित बीजों का उत्पादन दो तरह से किया जाता है। पहला, आधार बीजों की बुआई से और दूसरा, प्रमाणित बीजों की सतत बुआई या गुणन से। आमतौर पर प्रमाणित बीजों का उत्पादन, प्रादेशिक बीज निगम की देखरेख में चयनित तथा प्रशिक्षित प्रगतिशील किसानों के खेत पर किया जाता है। इस बीज की गुणवत्ता का प्रमाणीकरण प्रादेशिक बीज एजेंसी करती हैं। प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए लगायी गयी फ़सल के खेतों का निरीक्षण सम्बन्धित अधिकारी करते हैं। सामान्यतः यही बीज व्यावसायिक रूप से अन्य किसानों को सामान्य फ़सल उत्पादन के लिए बेचा जाता है। फिर प्रमाणीकरण एजेंसी की ओर से बीज-फ़सल के उत्पादक किसानों को बीजों के थैलों में लगाने के लिए नीले रंग का टैग दिया जाता है।
सत्यापित बीज उत्पादन
सत्यापित बीजों के उत्पादन के लिए भी आधार बीजों या फिर प्रमाणित बीजों से किया जाता है। लेकिन इसकी थैलियों पर किसी भी प्रमाणीकरण एजेंसी या संस्था का कोई टैग नहीं लगा होता। लेकिन ऐसा नहीं है कि सत्यापित बीज उम्दा क्वालिटी के नहीं होते। सत्यापित बीजों की शुद्धता की सारी जवाबदेही इसका उत्पादन और मार्केटिंग करने वाली संस्था की ही होती है।
बीज-फ़सल का निरीक्षण
आधार, प्रमाणिक और सत्यापित बीजों के लिए की जाने खेती की बीज निगम या राज्य के बीज प्रमाणन अधिकारी नियमित रूप से निरीक्षण करते हैं। ऐसा फ़सल की आवश्यकता के आधार पर दो से चार बार तक हो सकता है। लेकिन ज़्यादातर मामलों में निरीक्षण की तीन अवस्थाएँ होती हैं – पौधे का वानस्पतिक रूप धारण करते वक़्त यानी बाल्यावस्था में, पुष्पावस्था यानी युवावस्था में और फ़सल के पकने या प्रौढ़ावस्था में। इन्हीं निरीक्षणों के बाद बीज-फ़सल को उपयुक्त श्रेणी का टैग हासिल होता है।
बीजों के प्रमाणीकरण की शर्तें
- अनुवांशिक शुद्धताः जिस किस्म के बीज का प्रमाणीकरण होना है, उसे अनुवांशिक रूप से शत-प्रतिशत शुद्ध होना चाहिए।
- भौतिक शुद्धताः बीज में किसी भी प्रकार के निर्जीव पदार्थों जैसे कि भूसा, कंकड़, मिट्टी के ढेले, बालू, दोषपूर्ण बीज आदि नहीं होने चाहिए।
- अंकुरण क्षमताः उचित वातावरण में बीज से अंकुर या पौधे के निकलने का सीधा नाता अंकुरण क्षमता से होता है। अंकुरण क्षमता को ध्यान में रखकर ही बुआई के लिए ‘बीज दर’ तय की जाती है। इस तरह अंकुरण क्षमता का सीधा प्रभाव पैदावार और उसकी गुणवत्ता से भी होता है। इसीलिए बीज-फ़सल के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि उसकी अंकुरण क्षमता बढ़िया होनी चाहिए।
- खरपतवारों के बीज कतई नहीं हों: बीज-फ़सल की पैदावार में किसी भी खरपतवार के बीज कतई नहीं होने चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो जहाँ भी इन बीजों का इस्तेमाल होगा वहाँ पहले दिन से ही नुकसानदायक खरपतवारों की पहुँच भी हो जाएगी।
कैसे करें बीज-फ़सल की खेती?
बीज-फ़सल की खेती के ज़रिये आधार, प्रमाणित और सत्यापित बीजों की पैदावार से सीधे जुड़ने के इच्छुक किसानों को सबसे पहले तो उस फ़सल का सावधानीपूर्वक चयन करना चाहिए जो आपके इलाके की जलवायु और खेतों की प्रकृति के लिए सर्वथा उपयुक्त हों। ये भी सुनिश्चित करें कि चुना गया खेत पूरी तरह से खरपतवारों तथा मिट्टी सम्बन्धी रोगों से मुक़्त हो। खेत को समतल और फ़सल पृथक्करण की अपेक्षाओं के अनुरूप होना ज़रूरी है।
खेत की जुताई के वक़्त भी उन सावधानियों को अमल में लाना बेहद ज़रूरी है जिनकी सिफ़ारिश कृषि विशेषज्ञ करते हैं। जैसे बुआई के वक़्त खेत में डाले जाने वाले खाद और उर्वरक वग़ैरह की मात्रा तथा प्रत्येक फ़सल के लिए बुआई के लिए पंक्तियों के लिए निर्धारित फ़ासला या दूरी। बीज-फ़सल को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा देने में भी कोई कोताही नहीं होनी चाहिए।

बुआई से पहले बीजोपचार
बीज किसी भी किस्म का हो उसकी बुआई से पहले बीजों का उपचार या शोधन करना हमेशा बहुत ज़रूरी होता है। आधार, प्रमाणित या सत्यापित बीजों की पैदावार के लिए की जाने वाली खेती के लिए भी बीजोपचार की प्रक्रिया को अमल में लाना ही चाहिए। बीजोपचार का मतलब बुआई से पहले बीजों में फफूँदनाशक या कीटनाशक या दोनों दवाईयों को मिलाना है। दलहनी फ़सलों के मामले में बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना भी बेहद ज़रूरी है।
बीज-फ़सल की बुआई या रोपाई
बीजोपचार की निर्धारित प्रक्रिया को अपनाने के बाद फ़सल की बुआई या रोपाई भी हमेशा खेत में उचित नमी वाली अवस्था में ही और पंक्तिबद्ध ढंग से ही करनी चाहिए। ध्यान रहे कि बीज-फ़सल की खेती में बीज-दर साधारण फ़सल की अपेक्षा थोड़ी कम रखी जाती है। यहाँ तक कि पौधों और उनकी पंक्तियों के बीच की दूरी भी सामान्य फ़सल की तुलना में ज़रा ज़्यादा होनी चाहिए ताकि अंकुरण के बाद अवांछनीय पौधों को निकालने में सुविधा हो और साथ ही बाक़ी कृषि क्रियाएँ भी सुगमता से की जा सकें।
इसके अलावा, जिस खेत में बीज उत्पादन के लिए फ़सल की बुआई या रोपाई की जानी हो, उसमें चयनित प्रजाति के सिवाय अन्य किसी भी प्रजाति के बीजों की बुआई नहीं करनी चाहिए। इसी तरह, जिन फ़सलों के बीजों से नर्सरी में पौधे तैयार करके उन्हें रोपाई के लिए तैयार किया जाता है वहाँ भी हरेक अलग प्रजाति के बीजों के लिए पौधशालाएँ भी अलग-अलग तैयार करनी चाहिए।
खाद, उर्वरक और 16 पोषक तत्व
सभी पौधों और फ़सलों को अपने जीवनचक्र के संचालन के लिए मिट्टी से 16 पोषक तत्वों की ज़रूरत पड़ती है। इनके नाम हैं – कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फ़ॉस्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, ज़िंक, आयरन, कॉपर, बोरान, मैगनीज, मोलिबडनम और क्लोरीन। इनमें से सबसे ज़्यादा ज़रूरतें नाइट्रोजन, फ़ॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा से पूरी होती हैं। मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों के समुचित अनुपात का ब्यौरा मिट्टी की जाँच रिपोर्ट से मिलता है।
बीज-फ़सल की खेती में भी पौधों के अच्छे विकास तथा दानों के अच्छी तरह से विकसित होने के लिए भी मिट्टी में पाये जाने वाले 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसकी भरपाई के लिए कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट या सड़े गोबर की खाद को सन्तुलित और अनुशंसित मात्रा में देना बहुत ज़रूरी है। दरअसल, रासायनिक उर्वरकों से मिट्टी की अम्लीयता बढ़ जाती है। इस पर काबू पाने के लिए रासायनिक खादों के साथ जैविक खादों जैसे सड़ा गोबर, केंचुआ खाद, नीम, करंज और महुआ की खली भी डालना पड़ता है।
आमतौर पर किसान अपनी फ़सलों में यूरिया डालते हैं। लेकिन यूरिया से मिट्टी को सिर्फ़ नाइट्रोजन मिलता है। वहीं, डीएपी यानी डाई अमोनियम फ़ॉस्फेट डालने से फ़ॉस्फोरस के अलावा नाइट्रोजन भी मिलता है। इसी तरह, म्यूरिट ऑफ़ पोटाश को डालने से मिट्टी को केवल पोटाश मिलता है। कैल्शियम और मैग्नीशियम का अनुपात सुधारने के लिए मिट्टी में बारीक़ चूना या डोलोमाइट डाला जाता है तो ज़िंक की कमी को पूरा करने के लिए ज़िंक सल्फेट और बोरान को बढ़ाने के लिए बोरेक्स डालना पड़ता है।
फ़सल सुरक्षा, खरपतवार नियंत्रण और रोगिंग
बीज-फ़सल के खेतों का नियमित निरीक्षण करके ये देखते रहना भी बेहद ज़रूरी होता है कि फ़सल में कोई कीट या रोग तो नहीं लगा रहा। इस पर नियंत्रित के लिए छिड़काव वग़ैरह ज़रूरी हो तो इसका निदान भी निकटवर्ती कृषि संस्थान या कृषि विज्ञान केन्द्र या कृषि अधिकारी से परामर्श लेकर ही करना चाहिए। इसी तरह अवांछित पौधों और खरपतवारों से भी बीज-फ़सल को मुक्त रखना बेहद ज़रूरी है।
बीज-फ़सल की खेती में भी खरपतवारों को तत्परता से निकालकर नष्ट करना बेहद ज़रूरी होता है क्योंकि इसकी वजह से उपज को भारी नुकसान पहुँचाता है और उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। खरपतवारों के अलावा बीज-फ़सल की खेती में ‘रोगिंग’ की भी बहुत अहमियत है, क्योंकि इसका बीजों से शुद्धता से सीधा और गहरा नाता होता है। रोगिंग (Roguing), उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें बोयी गयी फ़सल की ही अन्य प्रजाति के या विजातीय पौधों को पहचानकर उन्हें हाथों से निकालकर नष्ट किया जाता है।
रोगिंग वाले पौधों को ‘ऑफ़ टाइप पौधे’ भी कहते हैं। इनके बीज कम गुणवत्ता वाले होते हैं और मुख्य फसल के साथ मिलकर उसकी गुणवत्ता को घटा देते हैं। इसीलिए इन्हें पौधों की बढ़वार के दौरान या फूल आने से पहले रंग से, पत्तियों की आकृति से या कटाई से पहले बालियों, फलियों अथवा घेंटियों की रंगत देखकर पहचानना पड़ता है। विजातीय पौधों को पहचानने और उखाड़कर नष्ट करने की सारी प्रक्रिया ‘रोगिंग’ कहलाती है।
बीज-फ़सल की सिंचाई, कटाई और भंडारण
बीज-फ़सल के लिए सिंचाई भी साधारण फ़सलों के मुक़ाबले ज़्यादा संवेदनशीलता से करना चाहिए क्योंकि यदि खेत में नमी हल्की पड़ने लगेगी तो उसका फ़सल की बढ़वार और बीजों की गुणवत्ता पर अवश्य असर पड़ेगा। इसी तरह, बीज-फ़सल को अधिक सिंचाई या जल भराव की दशाओं से भी बचाना बहुत ज़रूरी होता है। इस लिहाज़ से खेत में जल निकासी की दुरुस्त व्यवस्था का होना भी बेहद ज़रूरी है। बीज-फ़सल की कटाई भी बिल्कुल सही वक़्त पर होना आवश्यक है। कटाई से पहले किसानों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि दानों की नमी उपयुक्त मात्रा तक सूख चुकी है।
कटाई के बाद खलिहान में उपयुक्त ढंग से गहाई करने के बाद बिल्कुल उन्हीं दशाओं के हिसाब से भंडारण करना चाहिए, जिससे बीजों के प्रमाणीकरण की शर्तें पर कोई आँच नहीं आने पाए। भंडारण के वक़्त यदि सही सावधानी नहीं बरती गयी तो बीज-फ़सल की अंकुरण क्षमता और गुणवत्ता को नुकसान पहुँच सकता है। भंडारण से पहले भंडारगृह की अच्छी तरह सफ़ाई और पुताई करके ही भंडारित करें और आवश्यकतानुसार पैकिंग करके उपज को बीज निगम या उचित दाम देने वाली संस्था को बेचकर भरपूर लाभ कमाना चाहिए।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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