खाद्य तेल न सिर्फ़ भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि सेहत को बेहतर रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खाद्य तेलों के सेवन से लिपिड प्रोफाइल और मेटाबोलिक सिंड्रोम प्रभावित होते हैं। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है और सूजन भी प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है। इसीलिए खाद्य तेलों के सही चयन की बहुत अहमियत है। खाद्य तेलों की किस्मों में ‘धान की भूसी का तेल’ यानी ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ अपेक्षाकृत सबसे नया विकल्प है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इसे ख़ूब पसन्द करते हैं और सेहत के प्रति ज़्यादा जागरूक रहने वाले लोगों को इसके इस्तेमाल की हिदायत देते हैं।
भारत में अभी सालाना क़रीब 250 लाख टन खाद्य तेलों की खपत है। इसमें से हमारा घरेलू उत्पादन क़रीब 80 लाख टन का ही है। बाक़ी दो-तिहाई खपत की भरपाई आयात से होती है। देश की बढ़ती आबादी और खान-पान की आदतों में बदलाव की वजह से खाद्य तेलों की सालाना मांग 7-8 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। इस साल खाद्य तेलों का आयात 140 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। देश में पारम्परिक खाद्य तेलों की तुलना में ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ की हिस्सेदारी क़रीब 14 फ़ीसदी ही है।
खाने पकाने के काम में ‘राइस ब्रान ऑयल’ की खपत भले ही देश में बहुत कम हो, लेकिन इसका उपयोग कन्फेक्शनरी उत्पादों जैसे ब्रेड, स्नैक्स, कुकीज और बिस्कुट के अलावा पशुओं के चारे, जैविक खाद, औषधीय इस्तेमाल और मोम बनाने में भी किया जाता है। साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन, सिंथेटिक फाइबर, प्लास्टिसाइजर, डिटर्जेंट, इमल्सीफायर और फैटी एसिड के निर्माण में भरपूर उपयोग होता है। खुदरा बाज़ार में ‘राइस ब्रान ऑयल’ का दाम 125 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक होता है।

देश के कुल आयातित तेलों में पॉम ऑयल या पॉमोलीन का हिस्सेदारी क़रीब 80 फ़ीसदी है। पिछले वर्षों में अन्य तेलों के साथ परिष्कृतत पॉमोलीन के मिश्रण की वजह से भी इसकी खपत काफ़ी बढ़ी है। होटल, रेस्टो्रेन्ट् और पैकेज़्ड खाद्य उत्पादों को बनाने में बड़े पैमाने पर इसी तरह के खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, खाद्य तेलों से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की वजह से ग़ैर-परम्परागत खाद्य तेलों को फिल्टरिंग, ब्लीाचिंग और डी-ओडराइजेशन करके व्यावहारिक रूप से एक जैसा बना लिया गया है। इससे तेल रंगहीन, गन्धरहित और स्वाद-निरपेक्ष बन गये और रसोई में इनकी आसानी से अदला-बदली होती चली गयी।
‘राइस ब्रान ऑयल’ की ख़ूबियां
धान का इतिहास 10 हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना माना गया है। चीन और भारत की सभ्यताओं से फैलता हुआ धान अमेरिका में सन् 1647 में पहुंचा तो ब्राजील में इसकी आमद सन् 1750 में बतायी जाती है। आज 100 से ज़्यादा देशों में धान की करीब 18 हज़ार किस्में पैदा होती हैं। विश्व में पैदा होने वाले कुल अनाज में एक-चौथाई धान है। दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी का मुख्य आहार भी धान से मिलने वाला चावल है। धान की भूसी से निकलने वाले तेल यानी ‘राइस ब्रान ऑयल’ का इस्तेमाल एशिया में 2000 से अधिक वर्षों से किया जा रहा है। भारत, चीन, जापान, थाईलैंड और बाँग्लादेश इसके सबसे सफ़ल उत्पादक हैं।
भारत में ग़ैर-परम्परागत खाद्य तेलों में ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ और बिनौला के तेल की ख़ास अहमियत है। ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ का उत्पादन कृषि आधारित उद्योगों की श्रेणी में ही है, क्योंकि आम तौर पर किसान अपने धान को या तो मंडियों में बेचता है या फिर सीधे राइस मिलों को। ये राइस मिलें ही हैं जहाँ धान की भूसी का बड़ा भंडार बनता है और यदि राइस मिल के पास ‘राइस ब्रान ऑयल’ और भूसी से बनने वाले अन्य उत्पादों की सुविधा होती है तभी तेल का उत्पादन हो पाता है। इसी वजह से ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन या दाम से किसान सीधे लाभान्वित नहीं होते हैं।
‘राइस ब्रॉन ऑयल’ में पोषक तत्व और एंटीऑक्सिडेंट पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इसमें पॉली-अनसेचुरेटेड वसा (PUFA) और मोनो-अनसैचुरेटेड वसा (MUFA) का अनुपात बराबर होता है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रिशन (NIN) की ओर से भी कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और शूगर लेवल को नियंत्रित रखने के लिए इस खाद्य तेल के इस्तेमाल की सिफ़ारिश की गयी है।
जर्नल ऑफ़ न्यूट्रीशनल बायोकैमिस्ट्री में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ के सेवन से टाइप-2 मधुमेह के रोगियों में रक्त शर्करा में 30 फ़ीसदी की कमी आयी है। इसे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत रखने, असमय बूढ़ा होने से बचाने जैसे अनेक त्वचा सम्बन्धी विकारों और बुढ़ापे से जुड़े न्यूरो-डिजेनेरेटिव रोगों के लक्षण को धीमा करने के लिए भी जाना जाता है। रजोनिवृत्ति सम्बन्धी तकलीफ़ों में भी इस तेल के सेवन से फ़ायदा होता है।

‘राइस ब्रॉन ऑयल’ के औषधीय गुण
‘राइस ब्रॉन ऑयल’ में कैंसर-रोधी एंटीऑक्सिडेंट Tocotrienols पाया जाता है जो स्तन, फेफड़े, अंडाशय, यकृत, मस्तिष्क और अग्न्याशय में कैंसर बनाने वाली कोशिकाओं के विकास को नियंत्रित रखता है। इसमें आँखों के नीचे बनने वाले काले घेरे को भी दूर करने का भी गुण है। इससे रेडियो एक्टिव विकिरण का दुष्प्रभाव भी कम होता है। मुंह में पनपने वाले हानिकारक बैक्टीरिया को मारने, दांतों के बीच कैविटी से रोकथाम, मसूड़ों में सूजन और सांस की दुर्गंध को घटाने तथा को मसूड़ों को मज़बूती देने में भी ये खाद्य तेल फ़ायदेमन्द होता है।
भूरे रंग वाले धान की भूसी में राइस ब्रान ऑयल की बहुत पतली परत होती है। ये उसका सबसे पौष्टिक अंश है, क्योंकि इसमें विटामिन-ई और खनिजों की भरमार होती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, फ़ाइबर, शूगर, सोडियम और प्रोटीन नहीं होता। ‘राइस ब्रॉन ऑयल’ में चिपचिपापन कम होता है, इसलिए इसमें पका भोजन कम तैलीय लगता है। इस तेल से त्वचा में नमी को बनाये रखने में मदद मिलती है। इसीलिए इसे मॉइस्चराइजिंग के लिए सौन्दर्य प्रसाधनों में भी इस्तेमाल किया जाता है।
धान की भूसी का तेल उसकी भीतरी दीवारों में मिलता है। ये चावल के लिए रोगाणुओं से बचाव वाले कवच का काम करता है। इसके स्वाद में मूंगफली के तेल या अखरोट के बेहद हल्के स्वाद से मिलता-जुलता सोंधापन होता है। गर्म किये जाने पर ये तेल तक़रीबन स्वाद रहित हो जाता है। इसका रंग भूरा से सुनहरा भूरा के बीच का होता है। इसका स्मोक प्वाइंट यानी इसके ख़ुद जलकर धुंआ बनने का तापमान भी ख़ासा अधिक यानी 232 डिग्री सेल्सियस है। इसीलिए पकवानों को तलते वक़्त इस तेल के ख़ुद जलने का ख़तरा कम होता है। इसी वजह से भारत में सरसों के तेल के कई ब्रॉन्डों में भी ‘राइस ब्रान ऑयल’ मिलाया जाता है।

‘राइस ब्रान ऑयल’ बनाम ऑलिव ऑयल
जैतून के तेल (ऑलिव ऑयल) की तुलना में ‘राइस ब्रान ऑयल’ में विटामिन-ई की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है। ‘राइस ब्रान ऑयल’ में कोलेस्ट्राल और दिल की बीमारियों और सूजन सम्बन्धी तकलीफ़ें घटाने वाला ‘ओरिजनॉल’ प्रचुर मात्रा में होता है जबकि जैतून के तेल में ये नहीं होता। ‘राइस ब्रान ऑयल’ लम्बे वक़्त तक ख़राब नहीं होता, जबकि सभी खाद्य तेलों में से जैतून का तेल ज़्यादा नाज़ुक होता है और जल्दी ख़राब हो जाता है।
कैसे निकालते हैं ‘राइस ब्रॉन ऑयल’?
धान की भूसी से तेल निकालने के लिए chemical solvent process या सीधे धान के भूसे की पेराई करने का तरीका अपनाया जाता है। भूसे की सीधे पेराई से अपेक्षाकृत कम ‘राइस ब्रान ऑयल’ प्राप्त होता है। इसीलिए बड़े पैमाने पर ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन के लिए chemical solvent वाली गर्म प्रक्रिया को अपनाया जाता है। सीधे पेराई की तुलना में इससे ज़्यादा और शुद्ध खाद्य तेल मिलता है।
धान की भूसी से तेल निकलने की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले धान की भूसी को छांटा जाता है। फिर इसे भाप के ज़रिये 100 डिग्री सेल्सियम से अझिक तापमान पर गर्म करते हैं। इससे ‘राइस ब्रान ऑयल’ के अणु नरम पड़कर और धान की छिलके से अलग होकर तेल के रूप में प्राप्त होता है। इसे ‘केमिकल मैथड’ भी कहते हैं, जबकि धान के भूसे की सीधे पेराई करने वाली प्रक्रिया को ‘मेकैनिकल मेथड’ कहा गया है।

‘राइस ब्रान ऑयल’ के लिए सरकारी नीति
‘राइस ब्रान ऑयल’ को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की ओर से नेफेड (राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड) के फोर्टिफाइड ब्रैन राइस ऑयल का ई-लॉन्च किया। इसके ज़रिये उच्च गुणवत्ता वाला फोर्टिफाइड राइस ब्रैन ऑयल की मार्केटिंग सभी नेफेड स्टोर्स और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफार्म पर की जाएगी। ‘राइस ब्रान ऑयल’ की मार्केटिंग की ज़रूरतों को देखते हुए नेफेड और FCI (भारतीय खाद्य निगम) के बीच समझौता भी हुआ है। इसके तहत FCI से जुड़े राइस मिलों की ओर से उत्पादित ‘राइस ब्रान ऑयल’ को बाज़ार मुहैया करवाने की ज़िम्मेदारी नेफेड उठाएगी।
इसके साथ ही सरकार ने FCI (भारतीय खाद्य निगम) के क्षेत्रीय कार्यालयों को उनसे जुड़े राइस मिल मालिकों के साथ ऐसी कार्यशालाएं आयोजित करने का निर्देश दिया, जिससे ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन से समबन्धित उनकी तकनीकी ज़रूरतों का आंकलन करके उसे पूरा करने की रणनीति बनायी जा सके। सरकार ने राइस मिलों की संख्या, उनकी मिलिंग क्षमता, धान के भूसे की मात्रा, मवेशियों के चारे के लिए भेजे जा रहे भूसी की मात्रा और ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन के लिए भेजी जा रही भूसी की मात्रा का ब्यौरा भी जुटाने का कहा। ताकि ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन के लिए कितनी क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत है, इसका आंकलन हो सके।
भारत में तमाम कोशिशों के बावजूद तिलहन उत्पादन में इतना सुधार नहीं हो पा रहा जिससे खाद्य तेलों की खपत के मामले में हम आत्मनिर्भर बन सकें। हालांकि भारत, विश्व में तिलहनों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। फिर भी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए फिलहाल, हमें सालाना 65 से 70 हज़ार करोड़ रुपये का खाद्य तेल आयात करना पड़ रहा है। इससे भारत, खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक बन गया। सरकार की कोशिश है कि खाद्य तेल के रूप में ताड़ के तेल (पॉम ऑयल) की जगह ‘राइस ब्रान ऑयल’ के इस्तेमाल को ख़ासा बढ़ावा मिले, ताकि पॉम ऑयल के आयात को घटाकर विदेशी मुद्रा की बचत की जा सके। उम्मीद है कि उपरोक्त सरकारी पहल से स्वदेशी तेल उत्पादकों को भी बढ़ावा मिलेगा और आयातित खाद्य तेलों पर देश की निर्भरता घटेगी।
‘राइस ब्रान ऑयल’ का देश में उत्पादन
देश में ‘राइस ब्रान ऑयल’ के उत्पादन में लगातार सुधार हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2014-15 में ये 9.2 लाख टन था तो 2015-16 में 9.9 लाख टन और 2016-17 में 10.31 लाख टन हो गया। केन्द्र सरकार ने ‘राइस ब्रान ऑयल’ की मौजूदा 11 लाख टन उत्पादन क्षमता को जल्द से जल्द बढ़ाकर 18 लाख टन करने के उद्देश्य से प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से अपने क्षेत्रों में मौजूद राइस मिलों की क्षमता बढ़ाने का आग्रह किया है। इस सिलसिले में तेलंगाना, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों ने अतिरिक्त ‘राइस ब्रान ऑयल सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन प्लांट’ स्थापित करने पर सहमति जतायी है।
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