Thursday, 1 October 2026
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कश्मीर में ‘Swiss Saanen’ बकरी का बढ़ता क्रेज, ज्यादा दूध और कम खर्च से बदल सकती है डेयरी की तस्वीर

कश्मीर की वादियों में इन दिनों एक खास विदेशी नस्ल की बकरी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। स्विट्जरलैंड की सानेन नस्ल, जिसे दुनिया में ‘मिल्क क्वीन’ के रूप में जाना जाता है, घाटी में डेयरी सेक्टर के लिए नई उम्मीदें जगा रही है। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST-K) में लाए जाने के बाद से ही इसे देखने और खरीदने के इच्छुक लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि आम किसानों तक इसकी पहुंच बनने में अभी करीब तीन साल का समय लग सकता है।

शोध के तहत लाई गई खास नस्ल

विश्वविद्यालय के अनुसंधान कार्यक्रम के तहत कुल 24 सानेन बकरियां, जिनमें 20 मादाएं शामिल हैं, लाई गई हैं। इन पर दूध उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, प्रजनन दर और कश्मीर की जलवायु के अनुकूलन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जरूरी है कि इस नस्ल का प्रदर्शन अलग-अलग मौसमों में परखा जाए, तभी इसे बड़े स्तर पर अपनाने की सिफ़ारिश की जाएगी।

कश्मीर में ‘Swiss Saanen’ बकरी का बढ़ता क्रेज, ज्यादा दूध और कम खर्च से बदल सकती है डेयरी की तस्वीर
Pic Credit: pexels.com

कम चारे में ज्यादा दूध, यही है ख़ासियत

सानेन बकरी की सबसे बड़ी विशेषता इसका उच्च दूध उत्पादन है। बेहतर प्रबंधन में यह रोजाना 5 से 6 लीटर तक दूध दे सकती है, जो सामान्य स्थानीय नस्लों से कई गुना अधिक है। साथ ही, इसे गायों की तुलना में लगभग 70-80% कम चारा चाहिए होता है। ऐसे में सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए यह आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद विकल्प बन सकती है।

इनडोर पालन में भी सक्षम

कश्मीर जैसे क्षेत्र, जहां सर्दियों में लंबे समय तक बर्फबारी होती है और चारे की कमी रहती है, वहां सानेन बकरी एक बेहतर विकल्प मानी जा रही है। इसे छोटे इनडोर स्थानों में आसानी से पाला जा सकता है। इसका शांत और सौम्य स्वभाव इसे घर के भीतर पालने के लिए भी उपयुक्त बनाता है, जिससे शहरी और अर्ध-शहरी परिवार भी डेयरी गतिविधियों से जुड़ सकते हैं।

स्थानीय नस्लों के साथ क्रॉस ब्रीडिंग की योजना

वैज्ञानिक अब सानेन बकरियों का स्थानीय बकरवाल नस्ल के साथ संकरण (crossbreeding) करने की योजना बना रहे हैं। बकरवाल बकरियां कम दूध देती हैं, लेकिन बेहद मजबूत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं। इस संकरण से ऐसी नस्ल विकसित करने का लक्ष्य है, जो अधिक दूध देने के साथ-साथ कठोर मौसम को भी सहन कर सके।

स्वास्थ्य के लिहाज से भी खास

सानेन बकरी का दूध हल्का, आसानी से पचने वाला और लगभग 3-4% वसा युक्त होता है। इसमें A2 प्रकार का बीटा-केसीन प्रोटीन पाया जाता है, जिसे स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है। यही वजह है कि यह दूध विशेष रूप से बीमार और कमजोर रोगियों के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है।

अभी करना होगा इंतजार

हालांकि इस नस्ल को लेकर उत्साह काफी ज्यादा है, लेकिन वैज्ञानिक फिलहाल जल्दबाजी के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि पूरी तरह परीक्षण के बाद ही इसे किसानों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में सानेन बकरी कश्मीर की डेयरी अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है।

भविष्य की संभावनाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि सानेन नस्ल का सफ़ल विस्तार होने पर छोटे किसानों और शहरी परिवारों के लिए डेयरी आय का नया मॉडल विकसित हो सकता है। कम लागत, ज्यादा उत्पादन और आसान प्रबंधन के चलते यह नस्ल आने वाले वर्षों में ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है।

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Akshay Dubey

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