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“नई किस्म सच में बेहतर है या जोखिम?” भारत एक बार फिर खेती की नई तकनीक के मोड़ पर खड़ा है। बीटी कपास के दो दशक के अनुभव के बाद अब देश में नई जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलें और जीन-संपादित किस्मों, खासकर सरसों, पर चर्चा हो रही है। आज पूछे जा रहे सवाल वही हैं जो 2000 के शुरुआती वर्षों में उठे थे:
- क्या यह तकनीक सच में किसानों के लिए बेहतर है?
- क्या इससे पैदावार बढ़ेगी और खर्च घटेगा?
- क्या इसमें पर्यावरण या आर्थिक जोखिम हैं?
- बीज पर नियंत्रण किसका रहेगा?
यह बहस केवल विज्ञान की नहीं है; इसमें अर्थशास्त्र, नियम-कानून, पर्यावरण और राजनीति भी शामिल है। सरसों और अन्य फसलों में जीन संपादन पर चल रही चर्चा को समझने के लिए बीटी कपास का अनुभव और दुनिया में जीन तकनीक के विकास को देखना जरूरी है।
GM और जीन संपादन क्या हैं? फ़र्क क्या है?
जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलें तब बनती हैं जब किसी दूसरे जीव का जीन पौधे में डाला जाता है ताकि उसमें नया गुण आए। उदाहरण के लिए, बीटी कपास में Bacillus thuringiensis नामक जीवाणु का जीन डाला गया था, जिससे पौधा एक ऐसा प्रोटीन बनाता है जो खास कीटों, खासकर बोलवर्म, को मारता है। जीन संपादन में CRISPR-Cas जैसे औजारों से पौधे के अपने डीएनए में सटीक बदलाव किए जाते हैं। इसमें अक्सर बाहरी जीन नहीं डाला जाता, बल्कि मौजूदा जीन को बदला या नियंत्रित किया जाता है। कुछ जीन-संपादित फसलों में विदेशी डीएनए होता ही नहीं। यह फ़र्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई देशों में जीन-संपादित फसलों को पारंपरिक GM फसलों से अलग तरीके से नियंत्रित किया जाता है।
भारत का बीटी कपास अनुभव: एक ऐतिहासिक सबक
भारत ने 2002 में जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी (GEAC) की अनुमति के बाद बीटी कपास को व्यावसायिक खेती के लिए मंज़ूरी दी। उस समय कपास किसान बोलवर्म के भारी प्रकोप और कीटनाशकों के ज्यादा उपयोग से परेशान थे।
बीटी कपास से उम्मीद थी:
• कीटनाशक छिड़काव में कमी।
• कीट से कम नुकसान।
• ज्यादा पैदावार।
• किसान की आय में सुधार।
ICAR और अन्य अध्ययनों के अनुसार बीटी कपास तेजी से अपनाई गई। 2010 के बाद भारत के 90 प्रतिशत से अधिक कपास क्षेत्र में बीटी किस्में बोई जाने लगीं। शुरुआती वर्षों में पैदावार बढ़ी और भारत कपास निर्यात में आगे बढ़ा। बोलवर्म के खिलाफ कीटनाशक उपयोग में कमी आई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कीट का अनुकूलन: गुलाबी सुंडी की चुनौती
GM फसलों में सबसे बड़ा वैज्ञानिक जोखिम है कीटों में प्रतिरोध विकसित होना। जब एक ही कीटरोधी गुण बड़े क्षेत्र में लगाया जाता है, तो कीट धीरे-धीरे उस पर अनुकूल हो जाते हैं। समय के साथ गुजरात और महाराष्ट्र में गुलाबी सुंडी में बीटी के खिलाफ प्रतिरोध के मामले सामने आए। कृषि विश्वविद्यालयों और ICAR ने इसकी पुष्टि की। इसका मतलब यह नहीं कि बीटी कपास पूरी तरह असफ़ल रही, बल्कि यह दिखाता है कि कोई भी तकनीक स्थायी समाधान नहीं होती। सही प्रबंधन जरूरी है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में किसानों को कुछ प्रतिशत गैर-बीटी कपास बोना अनिवार्य किया गया, ताकि प्रतिरोध धीमा हो। भारत में यह पालन समान रूप से नहीं हुआ, जिससे समस्या बढ़ी। सबक यह है कि जैव तकनीक का उपयोग सावधानी और निगरानी के साथ करना पड़ता है।
पैदावार स्थिरता: क्या बीटी ही कारण था?
अर्थशास्त्रियों में आज भी चर्चा है कि कपास की पैदावार में वृद्धि कितनी बीटी तकनीक से हुई और कितनी अन्य कारणों से:
• सिंचाई में वृद्धि।
• बेहतर संकर बीज।
• खाद का अधिक उपयोग।
• बाजार कीमतें।
कुछ अध्ययन कहते हैं कि बीटी ने कीट नुकसान कम किया और स्थिरता बढ़ाई। कुछ कहते हैं कि शुरुआती बढ़त के बाद वृद्धि धीमी हुई। नई तकनीक का मूल्यांकन करते समय लंबी अवधि का आंकड़ा जरूरी है।
किसान की अर्थव्यवस्था: लागत और निर्भरता
शुरुआत में बीटी बीज महंगे थे। बाद में कई राज्यों में कीमतें नियंत्रित की गईं। शुरुआती वर्षों में किसानों को फ़ायदा हुआ, क्योंकि कीटनाशक खर्च घटा और उत्पादन बढ़ा। लेकिन बाद में लागत बढ़ी, नए कीट आए और चुनौतियां बढ़ीं।
आज सवाल यह है: क्या नई GM या जीन-संपादित फसलें किसान का खर्च घटाएंगी या बीज पर निर्भरता बढ़ाएंगी?
सरसों और जीन संपादन: आज की बहस
भारत खाद्य तेल का बड़ा आयातक है। देश में तिलहन उत्पादन बढ़ाना प्राथमिकता है।
GM सरसों को कई वर्षों से परीक्षण और समीक्षा के बाद सिफ़ारिशें मिलीं, लेकिन कानूनी चुनौतियों के कारण अंतिम अनुमति में देरी हुई।
समर्थकों का कहना है:
• संकर सरसों से पैदावार बढ़ सकती है।
• तेल की मात्रा बढ़ेगी।
• आयात पर निर्भरता घटेगी।
विरोधियों की चिंता है:
• परागण से अन्य फसलों पर असर।
• जैव विविधता पर प्रभाव।
• लंबे समय का पर्यावरण जोखिम।
• सुरक्षा परीक्षण पर्याप्त हैं या नहीं।
भारत में जीन संपादन पर नया नियम
2022 में भारत सरकार ने कुछ प्रकार की जीन-संपादित फसलों (SDN-1 और SDN-2) को सख्त GM नियमों से छूट देने के दिशा-निर्देश जारी किए, यदि उनमें विदेशी डीएनए नहीं हो। यह कदम अमेरिका और जापान जैसे देशों के नियमों से मेल खाता है। यूरोप में अभी भी सख्त नियम हैं, हालांकि चर्चा जारी है। यह दिखाता है कि भारत सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बहस
अमेरिका में GM सोयाबीन, मक्का और कपास वर्षों से उगाए जा रहे हैं। वहां ध्यान उत्पाद की सुरक्षा पर होता है, तकनीक पर नहीं। यूरोप में जनमत के कारण GM खेती सीमित है। लेकिन जलवायु बदलाव के कारण जीन संपादन पर चर्चा फिर शुरू हुई है। FAO और WHO ने कहा है कि बाज़ार में स्वीकृत GM खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य जोखिम साबित नहीं हुआ है, लेकिन हर मामले की अलग जांच जरूरी है।
पर्यावरण संबंधी चिंताएं
चिंताओं में शामिल हैं:
• गैर-लक्षित जीवों पर प्रभाव।
• मिट्टी की जैव विविधता।
• जीन का जंगली प्रजातियों में जाना।
• खरपतवार में प्रतिरोध।
अमेरिका में कुछ जगह हर्बीसाइड-सहिष्णु फसलों के कारण खरपतवार प्रतिरोधी बने। भारत में अभी तक कोई हर्बीसाइड-सहिष्णु GM खाद्य फसल स्वीकृत नहीं है।
जलवायु परिवर्तन और जैव तकनीक
बढ़ता तापमान और नए कीट दबाव के बीच जैव तकनीक को समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
जीन संपादन से संभव है:
• सूखा सहनशील किस्में।
• रोग प्रतिरोधी फसलें।
• बेहतर पोषण।
• जलवायु अनुकूल किस्में।
लेकिन केवल तकनीक ही समाधान नहीं है। मिट्टी स्वास्थ्य और सही खेती पद्धति जरूरी है।
मुख्य सवाल
“नई किस्म सच में बेहतर है या जोखिम?”
यह निर्भर करता है:
1. गुण कितना प्रभावी है।
2. प्रतिरोध प्रबंधन।
3. बीज की कीमत।
4. नियमों की पारदर्शिता।
5. पर्यावरण की देखभाल।
किसान क्या ध्यान रखें?
नई GM या जीन-संपादित फसल अपनाने से पहले किसान देखें:
• स्थानीय परीक्षण का परिणाम।
• बीज की लागत।
• कीट प्रबंधन योजना।
• बाज़ार स्वीकृति।
• सरकारी नीति।
तकनीक तभी सफल होती है जब:
• फसल चक्र अपनाया जाए।
• संतुलित खाद दी जाए।
• कीट निगरानी हो।
• मिट्टी स्वास्थ्य सुधारा जाए।
बीटी कपास से भारत को फ़ायदा भी मिला और सबक भी। जीन संपादन नया अध्याय है। यह सटीक बदलाव देता है, लेकिन जिम्मेदार प्रबंधन जरूरी है।
किसान के लिए सवाल सीधा है:
क्या यह किस्म जोखिम घटाएगी?
क्या आय बढ़ाएगी?
क्या लंबे समय तक टिकेगी?
खेती में कोई तकनीक स्थायी नहीं होती। हर नवाचार को निगरानी और समझदारी की जरूरत होती है। भारत फिर एक नए मोड़ पर है। आज लिए गए फैसले आने वाले वर्षों की खेती को प्रभावित करेंगे। सवाल यह नहीं कि तकनीक अच्छी है या बुरी। सवाल यह है कि क्या इसे सही तरीके से, किसान के हित में, लंबे समय के लिए अपनाया जाएगा।
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