गन्ने की खेती | भारत, भले ही गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक हो, लेकिन हमारे खेतों में गन्ने की उत्पादकता 65 से 69 टन प्रति हेक्टेयर की ही मिल पाती है। मिट्टी की पैदावार बढ़ाने के लिए खाद और उर्वरक के इस्तेमाल से लेकर, उन्नत बीज, सिंचाई, उचित देखभाल जैसे खेती के सारे जतन करने के बावजूद अक्सर गन्ना किसानों को मनमाफ़िक मुनाफ़ा नहीं होता। लेकिन गन्ना अनुसन्धान से जुड़े वैज्ञानिकों ने अब ऐसे अनूठे उपाय ढूँढ़ लिये हैं जिससे पैदावार दो से तीन गुना बढ़ सकती है। इन उपायों का नाम है – पादप वृद्धि हार्मोन्स: इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड।
क्या होती है हार्मोन्स की भूमिका?
इथ्रेल और जिबरेलिन, प्राकृतिक पादप वृद्धि हार्मोन हैं। इससे गन्ने के तने की लम्बाई बढ़ाने वाली स्टेम कोशिकाओं का विस्तार होता है, जहाँ शर्करा (कार्बोहाइड्रेट) जमा होता है। इस तरह जिबरेलिन के छिड़काव से गन्ने की शर्करा जमा करने की क्षमता और अन्ततः उत्पादन बढ़ता है। लेकिन ध्यान रहे कि किसानों को गन्ने के हार्मोन्स को अपनी मर्ज़ी से अन्य फसलों पर आज़माने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इससे लेने के देने पड़ सकते हैं।
भारत में गन्ने की खेती की चुनौतियाँ
भारत में गन्ने की कम पैदावार के लिए हमारी भौगोलिक स्थिति बेहद ज़िम्मेदार है। उष्णकटिबन्धीय इलाकों (tropical zone) में बीजों का कम जमाव, कल्लों का अलग-अलग समय पर बनना और तनों का अपर्याप्त विकास गन्ने की उत्तम पैदावार में भारी अड़चनें पैदा करते हैं। बुआई के करीब 45 दिनों बाद जब गन्ने की बढ़वार का वक़्त आता है तब उसकी पत्तियों को जैसे ढकाव या कवर या आच्छादन (ढकाव या cover) की ज़रूरत होती है तब उन्हें अनुकूल वातावरण मिल नहीं पाता। तब तीखी धूप की वजह से पौधों की काफ़ी शक्ति ख़ुद को सलामत रखने में खप जाती है। इसीलिए यदि इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड जैसे पादप वृद्धि हार्मोन्स का इस्तेमाल किया जाए तो गन्ने की खेती से जुड़ी अनेक गम्भीर चुनौतियाँ ख़त्म हो जाती हैं और पैदावार दो से तीन गुना ज़्यादा हो जाती है।
ज़िन्दा रहने में खपती है ज़्यादा ऊर्जा
दरअसल, बढ़वार के दौर में पत्तियों को आच्छादन (ढकाव या cover) की अपेक्षित सुरक्षा नहीं मिलने से गन्ने के पौधों की अधिकतर ऊर्जा प्रकाश संश्लेषण में खप जाती है। उनके लीफ-एरिया-इंडेक्स (Leaf area index) के घटने से पत्तियों का फैलाव, उनकी संख्या तथा तनों और जड़ों का विकास भी धीमा पड़ जाता है। इस दौर में ऊर्जा की भरपायी के लिए पौधे नाइट्रोजन की ख़पत भी ज़्यादा करते हैं, लेकिन उसी अनुपात में पैदावार नहीं दे पाते। तनों में अपेक्षित ऊतक निर्माण नहीं होने से कल्लों की मृत्यु दर भी बहुत ऊँची होती है।
गन्ना किसानों के लिए वरदान हैं हार्मोन्स का इस्तेमाल
इन्हीं चुनौतियों के समाधान के रूप में गन्ना वैज्ञानिकों ने इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड जैसे पादप वृद्धि हार्मोन्स का अनूठा प्रयोग किया। इससे न सिर्फ़ गन्ने का जमाव जल्दी हुआ बल्कि कल्लों की मृत्यु दर में भी गिरावट आयी और आख़िरकार, खेत में गन्ने के पौधों की संख्या और उनके औसत भार में भी इज़ाफ़ा हुआ। इस प्रयोग ने किसानों के खेतों में भी शानदार नतीज़े दिये तो तय हुआ कि गन्ने की बावक और पेड़ी फसल पर किसान यदि पादप वृद्धि हार्मोन्स का इस्तेमाल करें तो उन्हें भरपूर उपज मिलेगी और उनकी आमदनी बढ़ेगी।
इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड जैसे पादप वृद्धि हार्मोन्स के इस्तेमाल से सिंचाई और अन्य पोषक तत्वों की ज़रूरत भी कम पड़ती है। हालाँकि, यदि सिंचाई और पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिले तो पैदावार अवश्य ज़्यादा होता है, लेकिन इससे खेती की लागत बेहद बढ़ जाती है। गन्ने की पैदावार कम होने का दूसरा प्रमुख कारण कल्लों का अलग-अलग समय पर बनना भी है। यदि कल्लों का विकास एक साथ हो तो वो परिपक्व भी एक साथ होंगे तथा उनका वजन भी ज़्यादा होगा, उसमें रस की मात्रा और मिठास भी अधिर होगी। लिहाज़ा, यदि कल्ले बेमौत मरने से बचा जाएँ तभी किसान को फ़ायदा होगा।
गन्ने की खेती में कब करें हार्मोन्स का इस्तेमाल?
इसीलिए वैज्ञानिकों का मशविरा है कि ऐसे सारे उपाय होने चाहिए जिससे अगस्त-सितम्बर तक पौधे बढ़वार की अधिकतम सीमा को हासिल कर लें। क्योंकि इसके बाद के दौर में प्रकाश संश्लेषण से बनने वाले तत्व शर्करा के रूप में गन्नों के तने में जमा होने लगते हैं और उनका वजन बढ़ता है। इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड जैसे पादप वृद्धि हार्मोन्स के इस्तेमाल से गन्ने की कलिकाओं से पौधों का अंकुरन, उनका जमाव और आरम्भिक पौधों की संख्या ज़्यादा होती जाती है।
दो महीने में ही फसल की जड़ें भी ख़ूब विकसित हो जाती हैं। पत्तियाँ ऊर्ध्वाकार होने लगती हैं। इससे उनका निचला हिस्सा भी पूरी क्षमता से प्रकाश संश्लेषण कर पाता है और कल्ले मरते नहीं है। पौधों की संख्या घटती नहीं है। नतीज़तन, पेराई के लिए ज़्यादा गन्ना प्राप्त होता है।
गन्ने की खेती में क्या है हार्मोन्स के इस्तेमाल का असर?
इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड के छिड़काव और सूखी पत्तियों को गलाने से पेराई के लिए गन्नों की संख्या और उसमें बनने वाले पोरों की लम्बाई पहली पेड़ी में बढ़ जाती है। इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड के प्रभाव से गन्नों की अधिक संख्या प्रति हेक्टेयर प्राप्त करने के लिए स्मार्ट पत्ती आच्छादन होना और इसके अनुकूल ही जड़ तंत्र का विकास होना ज़रूरी है।
इसका असर ये होता है कि जहाँ पादप वृद्धि हार्मोन्स के इस्तेमाल के बाद गन्ने का एक पौधा 331 वर्ग सेंटीमीटर ज़मीन घेरता है, वहीं परम्परागत कंट्रोल विधि में इसे 800 वर्ग सेंटीमीटर ज़मीन की ज़रूरत पड़ती है। इस तरह के ऑर्किटेक्चरल बदलाव से गन्ने की पैदावार जहाँ 255 टन प्रति हेक्टेयर मिलती है, वहीं कंट्रोल विधि की पैदावार 70 से 85 टन प्रति हेक्टेयर की रहती है। साफ़ है कि पादप वृद्धि हार्मोन्स इथ्रेल और जिबरैलिक एसिड के छिड़काव से गन्ने के उसी खेत की पैदावार तीन गुना तक बढ़ सकती है।

पेड़ी की गन्ने के लिए भी उपयोगी हैं हार्मोन्स
लखनऊ स्थित भारतीय गन्ना अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, बसन्तकालीन गन्ने में पादप वृद्धि हार्मोन्स ने शानदार नतीज़े दिये हैं। पेड़ी की फसल से पेराई के लिए प्रति हेक्टेयर 3.06 लाख गन्ना प्राप्त हुआ और इसका वजन 183.2 टन रहा।
इसी तरह शरदकालीन गन्ने में पादप वृद्धि हार्मोन्स के इस्तेमाल से 330 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार प्राप्त हुई, जबकि कंट्रोल में औसतन 129 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार ही मिल पाती है। कंट्रोल विधि में अधिकतम कल्ले 4.59 लाख प्रति हेक्टेयर, उनकी मृत्यु दर 66.7 प्रतिशत, पेराई के लिए प्राप्त गन्नों की संख्या 1.53 लाख प्रति हेक्टेयर और पैदावार 99.8 टन प्रति हेक्टेयर हासिल हुई।
सूखी पत्तियों को सड़ना भी है लाभकारी
गन्ना शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने पाया कि पेड़ी की फसल में भी कटाई के 60 दिनों बाद इथेल का 100 PPM और जिबरेलिक एसिड-3 का 90, 120, 150 दिनों के बाद छिड़काव करने से भी कल्लों की मृत्यु दर घट जाती है। जीवित कल्लों में भी पोरों की लम्बाई और तनों की वृद्धि दर बढ़ जाती है। इसके कारण कंट्रोल विधि की तुलना में 66.5 टन प्रति हेक्टेयर ज़्यादा पैदावार मिली।
यही नहीं, यदि पेड़ी शुरू करने से पहले उसमें गन्नों की सूखी पत्तियाँ फैला दी जाएँ और इन्हें सड़ाने के लिए पूसा कम्पोस्ट इनाकुलेंट (300 ग्राम/टन सूखी पत्ती) डाला जाये तो कल्लों की संख्या 6.73 लाख प्रति हेक्टेयर प्राप्त हुई और उनकी मृत्युदर भी 54.5 प्रतिशत घट गयी।
कैसे करें गन्ने के हार्मोन्स का इस्तेमाल?
उपरोक्त सभी बातों का ध्यान रखकर इथ्रेल और जिबरेलिक एसिड का प्रयोग करके बीजों के शीघ्र और अधिक जमाव, शुरू की अवस्था में वृद्धि दर तेज़ रखने, कल्लों की बढ़वार एक साथ करवाने, कल्लों की मृत्युदर घटाने और प्रकाश संश्लेषण के अवयवों का वैज्ञानिक उपयोग कर गन्नों की संख्या, उनका औसत भार और उससे मिलने वाली चीनी की मात्रा को बढ़ाने का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किसानों के खेतों में भी किया गया।
इथ्रेल और जिबरेलिक एसिड के बारे में ज़्यादा और व्यावहारिक जानकारी के लिए किसानों को अपने नज़दीकी कृषि विकास केन्द्र या कृषि अधिकारी से सम्पर्क करना चाहिए। ताकि, गन्ने की खेती की उन्नत और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी आमदनी को बढ़ा सकें।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

ये भी पढ़ें:
- Rabi Campaign 2026: किसानों की आमदनी बढ़ाने और आत्मनिर्भर भारत के लिए National Agriculture Conference28-29 सितंबर 2026 को रबी अभियान 2026 (Rabi Campaign 2026) के लिए National Agriculture Conference बुलाया है। ये आयोजन दिल्ली के पूसा स्थित भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम सभागार में होगा।
- बिहार में मछली पालन का नया दौर: नाबार्ड ने दिया 195 करोड़ रुपये का लोन, बदलेगी किसानों की किस्मतमछली पालन बढ़ने से सिर्फ तालाबों में मछली ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि चारा, परिवहन, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और भंडारण जैसे कामों को भी बढ़ावा मिलेगा।
- Holstein Friesian Cow: दुनिया की सबसे ज़्यादा दूध देने वाली नस्ल, जानिए पहचान, वजन और भारत में कीमतहोल्स्टीन गाय की सबसे आसान पहचान इसका बड़ा और मजबूत शरीर है। एक वयस्क मादा गाय का वजन आमतौर पर 600 से 700 किलोग्राम तक होता है, जबकि इस नस्ल के सांड इससे काफी भारी होते हैं
- भूपेन्द्र यादव ने 58 Tiger Reserves के नए मूल्यांकन चक्र का किया शुभारंभभूपेन्द्र यादव ने 58 Tiger Reserves के 6th Cycle of MEE-TR की शुरुआत की और वैज्ञानिक संरक्षण पर ज़ोर दिया।
- ICAR-CMFRI ने Tuna मछली को लेकर उपभोक्ताओं को दी ज़रूरी सलाहICAR-CMFRI ने Tuna मछली को लेकर कहा कि एक क्षेत्र में मिले परजीवी के आधार पर भारतीय मछलियों से दूरी बनाने की ज़रूरत नहीं है।
- आंध्र प्रदेश के रायलसीमा का विकास: 1 लाख करोड़ रुपये के हॉर्टिकल्चर हब की रखी जाएगी आधारशिलारायलसीमा हब को रायलसीमा के चार अविभाजित जिलों के साथ-साथ प्रकाशम और नेल्लोर जिलों में डेवलप किये जाएंगे। इसका मेन टार्गेट सूखे से प्रभावित इलाकों में बागवानी को बढ़ावा देना है।
- Resilient Dairy Alliance की National Consultation में जलवायु अनुकूल डेयरी पर ज़ोरResilient Dairy Alliance की National Consultation में जलवायु अनुकूल डेयरी और टिकाऊ विकास पर चर्चा हुई।
- बिहार कैबिनेट का बड़ा फैसला: पशुपालकों को ब्याज पर 100 फीसदी सब्सिडी,किसानों-डेयरी सेक्टर को तोहफाइस योजना पर अगले तीन साल में 160 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च होंगे। इसका मकसद पशुपालकों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और राज्य में दूध के प्रोडक्शन को बढ़ावा देना है।
- National Zoological Park में World Rhino Day पर जागरूकता कार्यक्रमNational Zoological Park में World Rhino Day पर गैंडा संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता से जुड़े कई कार्यक्रम आयोजित किए गए।
- मध्य प्रदेश कैबिनेट का ऐतिहासिक फैसला: 13 हज़ार करोड़ से कृषि और सिंचाई को मिलेगी नई उड़ानमुख्यमंत्री मोहन यादव ने साफ किया है कि राज्य सरकार कृषि विकास के तहत उत्पादन बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रही है।
- PM Surya Ghar Yojana Delhi 2026: छत पर सोलर पैनल लगाएं, शुरू हुआ Registration PortalKisan of India को Google पर जोड़ें दिल्ली के मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 21 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना (PM Surya Ghar Yojana Delhi 2026) के लिए दिल्ली का रजिस्ट्रेशन पोर्टल शुरू कर दिया है। इसके तहत राष्ट्रीय राजधानी के 2.25 लाख घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का टारगेट… Read more: PM Surya Ghar Yojana Delhi 2026: छत पर सोलर पैनल लगाएं, शुरू हुआ Registration Portal
- WWF Global Conservation Conference में जंगलों के साथ Grasslands और Wetlands बचाने पर ज़ोरWWF Global Conservation Conference में भूपेंद्र यादव ने वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर ज़ोर दिया।
- बिना टच किये मछली का Measurement! ICAR-CMFRI का ‘MatsyaMetri’App बदल देगा Fisheries Research की तस्वीर‘MatsyaMetri’ को ARCore-supported Android devices के लिए डिजाइन किया गया है। ‘MatsyaMetri ‘ एक इमेज बेस्ड टूल है। यूज़र मछली की तस्वीर लेता है और ऐप अपने आप उसके आयामों का अनुमान लगाकर माप दर्ज कर लेता है।
- लखनऊ का मलिहाबादी दशहरी आम अब ग्लोबल पहचान की ओर, ODOP में होगा शामिलमलिहाबादी दशहरी आम की मांग अब 25 से अधिक देशों में है। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, कनाडा, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह आम पहुंच रहा है।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पर्यावरण और जलवायु कार्रवाई को लेकर सहयोग पर दिया ज़ोरद्रौपदी मुर्मू ने NGT कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर ज़ोर दिया।
- केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय का बड़ा ऐलान: रेशम उत्पादक किसानों की बढ़ेगी आमदनी,’सर्वश्रेष्ठ रेशम किसान पुरस्कार’ की शुरुआत की घोषणासरकार की रणनीति सीधी और वैज्ञानिक है। शहतूत के पत्तों की पैदावार बढ़ाकर और रेशम के कीड़ों के पालन-पोषण के राउंड को बढ़ाकर किसानों की आमदनी 10 से 12 लाख रुपये तक ले जाने का टारगेट है।
- पराली जलाने पर केंद्र सख़्त: ज़मीन के रिकॉर्ड में 15 महीने तक दर्ज रहेगा नाम, दोबारा जलाने पर और कड़ी कार्रवाई!ये नियम दिल्ली-एनसीआर और आसपास के उन इलाकों में लागू होगा जहां पराली जलाने की घटनाओं का असर दिल्ली की हवा पर पड़ता है।
- Samriddh Vidisha Model: तैयार हुआ ग्रामीण गरीबी को जड़ से ख़त्म करने के लिए नया रोडमैपSamriddh Vidisha Model की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि आमदनी के एक नहीं, कई साधन है। किसानों को आधुनिक खेती के साथ दूध, बकरी, मुर्गी और मधुमक्खी पालन से जोड़ा जाएगा, ताकि एक सोर्स रुकने होने पर परिवार न बिखरे।
- दक्षिणी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2026 में राज्यों को समय पर लक्ष्य पूरा करने के निर्देशदक्षिणी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2026 में राज्यों से Farmer ID, AgriStack और कृषि लक्ष्यों को तय समय में पूरा करने को कहा गया।
- Mahila Shetkari Portal: महाराष्ट्र सरकार का ऐतिहासिक कदम,अब खेत में काम करने वाली हर महिला बनेगी ‘किसान’अधिनियम के अनुसार, महिला को किसान मानने का आधार सिर्फ ज़मीन का मालिकाना हक नहीं, बल्कि खेती में उसकी ‘वास्तविक भागीदारी’ होगी।





















