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हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के घुमारवीं विकास खंड के सूई गांव के किसान सुरेंद्र भारती आज अपने खेतों में ऐसी खेती कर रहे हैं, जिसे देखकर आसपास के किसान भी प्रभावित हो रहे हैं। 3 बीघा ज़मीन से शुरू हुआ था उनका प्राकृतिक खेती का सफर। सब्ज़ियों की अच्छी पैदावार, कम बीमारी और बेहतर स्वाद ने उन्हें प्राकृतिक खेती की ओर और मज़बूत किया है।
सुरेंद्र ने 2019 में नौणी विश्वविद्यालय से प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने खेतों में जीवामृत, घनजीवामृत और सप्तधान्यांकर अर्क जैसे प्राकृतिक खेती के आदानों का इस्तेमाल शुरू किया। इसका असर उनकी फ़सलों पर भी देखने को मिला।
3 बीघा से शुरू हुई खेती की नई शुरुआत
प्रशिक्षण लेने के बाद सुरेंद्र ने अपने खेतों में गेहूं और मक्का जैसी अनाज वाली फ़सलों के साथ टमाटर, मटर, भिंडी और मूली भी उगाई। एक नए खेत में उन्होंने टमाटर की फ़सल प्राकृतिक खेती के तरीके से लगाई। इसके आसपास के खेतों में रासायनिक तरीके से उगाए गए टमाटर थे। सुरेंद्र ने दोनों फ़सलों की तुलना की तो उन्हें प्राकृतिक खेती वाले टमाटर में बीमारियां कम दिखाई दीं।
इस अनुभव ने उनका भरोसा और बढ़ाया। आज वह अलग-अलग फ़सलों को मिलाकर खेती करते हैं और खेत में उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करने पर ज़ोर देते हैं। उनके खेतों में मक्का जैसी फ़सलों के साथ दूसरी फ़सलें भी उगाई जाती हैं।
बीमारी कम हुई तो बढ़ा भरोसा
सुरेंद्र बताते हैं कि उनके खेतों में प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद सब्ज़ियों में बीमारी का असर कम देखने को मिला। यही वजह है कि अब आसपास के लोग भी उनके खेतों में तैयार सब्ज़ियों को पसंद कर रहे हैं।
उनके मुताबिक़, प्राकृतिक खेती से तैयार सब्ज़ियों की गुणवत्ता और स्वाद उन्हें अलग पहचान देते हैं। यही अनुभव वह दूसरे किसानों के साथ भी साझा करते हैं। किसान बैठकों और चर्चाओं में वह इस तरीके के बारे में बताते हैं और लोगों को अपने खेत में इसके नतीजे देखने के लिए भी कहते हैं।
किसान मोर्चा के ज़रिए दूसरे किसानों तक पहुंच
सुरेंद्र भारती केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं। वह बिलासपुर जिला किसान मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं। संगठन के माध्यम से वह जिले के किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देते हैं और इस तरीके को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
उनका कहना है कि प्रदेश सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है और किसानों को मिलने वाली सहायता इसी दिशा में एक कदम है। इस वजह से किसानों के बीच भी इस खेती को लेकर रुचि बढ़ रही है।
बाज़ार में मिलने लगी अलग पहचान
सुरेंद्र अपने खेतों में तैयार उत्पाद बेचने के लिए जिला अधिकारी कार्यालय भी जाते हैं। वहां लगाए गए प्राकृतिक खेती के स्टॉल पर उनके उत्पाद जल्दी बिक जाते हैं। अभी वह सामान्य बाज़ार भाव पर अपनी उपज बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि आगे प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पादों को बेहतर कीमत मिल सकती है।
कोरोना महामारी के समय लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी। सुरेंद्र मानते हैं कि इसका फ़ायदा भी प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को मिला है, क्योंकि लोग खेती के तरीके और खाने की गुणवत्ता को लेकर पहले से ज़्यादा ध्यान देने लगे हैं।
कम लागत और बेहतर भोजन की उम्मीद
सुरेंद्र भारती के लिए प्राकृतिक खेती सिर्फ़ कम लागत में फ़सल उगाने का तरीक़ा नहीं है। वह इसे किसान और खेत दोनों के लिए फ़ायदेमंद मानते हैं। उनका मानना है कि जब खेती में बाहर से खरीदे जाने वाले संसाधनों पर ख़र्च कम होता है, तो किसान के पास बचत की गुंजाइश बढ़ती है।
आज सुरेंद्र करीब 4 हेक्टेयर ज़मीन में खेती कर रहे हैं और दूसरे किसानों को भी अपने अनुभव से जोड़ रहे हैं। उनका सफल खेती मॉडल यह दिखाता है कि सही जानकारी और उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल से प्राकृतिक खेती को अपने खेत के हिसाब से अपनाया जा सकता है।
सूई गांव से शुरू हुई सुरेंद्र भारती की यह कोशिश अब आसपास के किसानों के लिए एक उदाहरण बन रही है। खेत में दिख रहे बदलाव और बाज़ार में मिल रही प्रतिक्रिया ने उनके भरोसे को और मज़बूत किया है। उनके लिए प्राकृतिक खेती अब केवल खेती की एक विधि नहीं, बल्कि कम ख़र्च में बेहतर और पोषण से भरपूर भोजन तैयार करने की दिशा में एक रास्ता बन चुकी है।
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