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ग्लोबल वार्मिंग से हमारी थाली को कौन बचाएगा? जब आप राजनेताओं के हाथ मिलाने वाले विजुअल्स और कूटनीतिक बैठकों की खबरों से परे देखते हैं, तो मानव जीवन को बचाने की असली लड़ाई बड़े सम्मेलनों में नहीं लड़ी जा रही है। यह लड़ाई एक माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी) के लेंस के नीचे, बीजों के डीएनए (DNA) के भीतर, और ग्लोबल साउथ के देशों में फैले एक साझा ‘बायोलॉजिकल नेटवर्क’ में लड़ी जा रही है।
ब्रिक्स (BRICS) के ‘जीनोम नेटवर्क’ (Genome Network) में आपका स्वागत है—यह दुनिया भर की खेती के लिए बेहतरीन ‘क्लाइमेट सर्वाइवल किट’ (बचाव का साधन) तैयार करने का एक ओपन-सोर्स और महाद्वीपों में फैला साझा जैविक गठबंधन है।
यह संकट अब भविष्य की कोई दूर की बात नहीं रह गया है। अल नीनो (El Niño) का लगातार गंभीर होना, मानसून का अजीबोगरीब ढंग से बदलना, और अचानक पड़ने वाले सूखे (Flash droughts) ने हमारी मिट्टी के रसायन को पूरी तरह से बदल दिया है। दशकों से हमारी पारंपरिक फ़सलें केवल अच्छे और स्थिर मौसम में ज़्यादा पैदावार देने के लिए तैयार की गई थीं, लेकिन वे इस नए अस्थिर मौसम को झेलने के लिए जैविक रूप से (Biologically) तैयार नहीं हैं। गेहूं के दाने भरते समय आई सिर्फ एक हीटवेव (गर्म हवा) पूरी फ़सल को बर्बाद कर सकती है। मानसून में हुई एक देरी लाखों हेक्टेयर धान के खेतों को बंजर बना सकती है।
जिंदा रहने के लिए, हमारी खेती में एक जेनेटिक (अनुवांशिक) क्रांति का होना ज़रूरी है। यह कहानी इस बात की है कि कैसे दुनिया की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाएं अपने बीजों के जैविक कोड (Biological codes) को एक साथ मिला रही हैं। मकसद यह सुनिश्चित करना है कि खेती का भविष्य अब सिर्फ बारिश की अनिश्चितता पर निर्भर न रहे, बल्कि साझे विज्ञान की सटीक और ठोस ताकत पर निर्भर करे।
ग्लोबल साउथ का ‘जेनेटिक बैंक’
दशकों से, कृषि बायोटेक्नोलॉजी (Agri-Biotechnology) की सबसे एडवांस तकनीकें पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कड़े नियंत्रण में थीं। जेनेटिक खोजों को कड़े पेटेंट (Patent) के पीछे छुपा कर रखा जाता था, जिससे मौसम की मार झेल सकने वाले बीज एक बहुत महंगी और प्राइवेट जागीर बन गए थे। ब्रिक्स (BRICS) का कृषि ढांचा बीजों की ताकत को एक ‘डिजिटल पब्लिक गुड’ (सबके लिए मुफ्त और खुली जानकारी) मानकर इस एकाधिकार को तोड़ता है।
विजुअल टिप (वीडियो/आर्टिकल के लिए): एक इन्फ्रारेड सैटेलाइट मैप का विजुअल दिखाएं जिसमें एक महाद्वीप सूखे से लाल और गर्म दिख रहा है, जो अगले ही फ्रेम में एक सूखे, दरार वाले खेत में उगते हुए एक बेहद मज़बूत बीज के क्लोज़-अप शॉट में बदल जाता है।
यह ओपन-सोर्स बायोलॉजिकल नेटवर्क ग्लोबल साउथ के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से चलता है: भारत का भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), ब्राज़ील का EMBRAPA, चीन का कृषि विज्ञान अकादमी (CAAS), और दक्षिण अफ्रीका का कृषि अनुसंधान परिषद (ARC)
ये सिर्फ सरकारी दफ्तर नहीं हैं; ये दुनिया के कुछ सबसे बड़े और विविध ‘जर्मप्लाज्म बैंकों’ (Germplasm Banks) के रखवाले हैं। जर्मप्लाज्म किसी भी जीव का जीवित जेनेटिक संसाधन होता है—जैसे बीज, ऊतक (Tissues), और डीएनए अनुक्रम, जिनमें उस पौधे का पूरा विकासवादी इतिहास छिपा होता है। जब ये संस्थान मिलकर काम करते हैं, तो वे असल में अपनी-अपनी राष्ट्रीय जेनेटिक हार्ड ड्राइव को मिलाकर एक विशाल, ओपन-सोर्स डेटाबेस बना लेते हैं।
अगर नई दिल्ली में पौधों का कोई वैज्ञानिक सरसों की एक ऐसी किस्म विकसित करने की कोशिश कर रहा है जो सर्दियों में अचानक बढ़ने वाले तापमान को सह सके, तो उसे अब शून्य से शुरुआत करने की ज़रूरत नहीं है। ब्रिक्स (BRICS) एग्रीकल्चरल रिसर्च प्लेटफॉर्म के जरिए, वे चीन या दक्षिण अफ्रीका से विशिष्ट जेनेटिक अनुक्रम (Genetic sequences) या जर्मप्लाज्म मांग सकते हैं, जहां शायद मॉलिक्यूलर (आणविक) स्तर पर इस तरह की गर्मी सहने की समस्या का समाधान पहले ही खोजा जा चुका हो।
क्लाइमेट-स्मार्ट बीज को डिकोड करना
आखिर ये वैज्ञानिक आपस में क्या साझा कर रहे हैं, और यह आम किसान के लिए “सर्वाइवल किट” (बचाव किट) में कैसे बदलता है? इसका पूरा फोकस उन विशिष्ट जेनेटिक गुणों की पहचान करने, उन्हें अलग करने और ट्रांसफर करने पर है जो पौधों को अत्यधिक तनाव (खराब मौसम) में जीवित रहने में मदद करते हैं।
1. सूखे से लड़ने की ताकत और जड़ों की बनावट (Drought Tolerance)
जब पानी की कमी होती है, तो पौधे का जीवित रहना मिट्टी के नीचे छिपी उसकी जड़ों की बनावट पर निर्भर करता है। ब्राज़ील के EMBRAPA के वैज्ञानिकों ने ‘सेराडो’ (Cerrado) नामक एक बेहद गर्म और सूखे सवाना क्षेत्र में खेती करने में दशकों की महारत हासिल की है। उन्होंने फ़सलों में ऐसे विशेष जीन की पहचान की है जो जड़ों को बहुत गहराई तक और तेज़ी से बढ़ने में मदद करते हैं, ताकि लंबे समय तक सूखा पड़ने पर भी वे ज़मीन के बहुत नीचे छिपी नमी को सोख सकें।
इस बायोलॉजिकल डेटा को ICAR के साथ साझा करके, भारतीय वैज्ञानिक इन गहरी जड़ों वाले जेनेटिक गुणों को भारत की स्थानीय दलहन (दालों) या तिलहन फ़सलों में डाल सकते हैं। इससे ऐसी फ़सलें बनेंगी जो मानसून की देरी के बावजूद बिना मरे जीवित रह सकेंगी।
2. गर्मी सहने की क्षमता (Thermal Regulation)
जैसे-जैसे दुनिया का औसत तापमान बढ़ रहा है, गेहूं जैसी फ़सलों को भारी ‘थर्मल स्ट्रेस’ (गर्मी का तनाव) का सामना करना पड़ता है, जो दाने के विकास के लिए ज़रूरी प्रोटीन को नष्ट कर देता है। यह साझा जीनोम नेटवर्क पौधों की प्राचीन और जंगली किस्मों (Landraces) के डीएनए की मैपिंग कर रहा है—आधुनिक फ़सलों के वे जंगली पूर्वज जो स्वाभाविक रूप से झुलसाने वाली गर्मी में उगते थे।
वैज्ञानिक उन सटीक जीनों की पहचान कर रहे हैं जो इन जंगली पौधों को भीषण गर्मी में अपने ‘स्टोमेटा’ (पत्तों के सूक्ष्म छिद्रों) को नियंत्रित करने और पानी के नुकसान को रोकने में मदद करते हैं। इस जानकारी से वे बीजों की ऐसी नई किस्में तैयार कर सकते हैं जो तापमान के 40 डिग्री सेल्सियस पार करने पर भी मुरझाएंगी नहीं और अच्छी पैदावार देंगी।
3. खारेपन से लड़ने की ताकत (Salinity Tolerance)
समुद्र तटीय खेती वाले क्षेत्रों में, बढ़ता समुद्री जलस्तर और भयानक चक्रवात नमकीन पानी को ज़मीन के अंदर तक धकेल रहे हैं, जिससे मिट्टी में खारापन आ रहा है। चीन के CAAS के कृषि वैज्ञानिकों ने “सी-वाटर राइस” (समुद्री पानी में उगने वाला चावल) बनाने में बड़ी सफलता हासिल की है—ये ऐसी किस्में हैं जो बेहद खारी मिट्टी में भी फल-फूल सकती हैं। ब्रिक्स (BRICS) नेटवर्क के जरिए, यह खारापन सहने वाला जेनेटिक डेटा भारत और दक्षिण अफ्रीका के खतरे वाले तटीय इलाकों के लिए मज़बूत फ़सलें विकसित करने के लिए साझा किया जा रहा है, जिससे बंजर ज़मीन को फिर से उपजाऊ खेतों में बदला जा सकेगा।
विजुअल टिप (वीडियो/आर्टिकल के लिए): ड्रोन के टॉप-एंगल से लिया गया स्प्लिट-स्क्रीन (दो हिस्सों में बंटा) विजुअल दिखाएं। एक तरफ भूरा और सूखा खेत (पारंपरिक बीज) है, जबकि दूसरी तरफ हरा-भरा खेत (क्लाइमेट-एडॉप्टेड बीज) है, जो खराब मौसम के ऊपर जेनेटिक इंजीनियरिंग की ताकत को साफ तौर पर दिखाता है।
सोयाबीन, बाजरा और उच्च-मूल्य वाली खेती का भविष्य
यह जैविक आदान-प्रदान (Biological exchange) सिर्फ लैब्स की थ्योरी तक सीमित नहीं है; यह सक्रिय रूप से बदल रहा है कि ज़मीन पर क्या उगाया जा रहा है और कैसे उगाया जा रहा है।
सोयाबीन का ही उदाहरण लें, जो दुनिया भर में एक बहुत अहम कमोडिटी (उत्पाद) है। ब्राज़ील सोयाबीन उत्पादन में एक ग्लोबल पावरहाउस है, जिसके पास सोयाबीन के ऐसे बीजों की विशाल जेनेटिक लाइब्रेरी है जो अलग-अलग तरह के खराब मौसम को सह सकते हैं। वहीं भारत, जो खाद्य तेल के भारी आयात बिल को कम करना चाहता है, उसे उन इलाकों में अपनी तिलहन (Oilseed) पैदावार बढ़ाने की सख्त ज़रूरत है जहां बारिश अनिश्चित होती है। ब्राज़ील के सूखे से लड़ने वाले सोयाबीन जेनेटिक्स को भारत के ICAR के स्थानीय ब्रीडिंग प्रोग्राम्स के साथ मिलाना, सीधे तौर पर मौसम से लड़ने की तकनीक का आदान-प्रदान है।
इसके साथ ही, भारत भी अपनी बायोलॉजिकल महारत दुनिया को दे रहा है। मोटे अनाज या बाजरा (श्री अन्न), जो भारतीय उपमहाद्वीप और अफ्रीका के मूल निवासी हैं, असल में बेहतरीन क्लाइमेट-सर्वाइवल फ़सलें (खराब मौसम में बचने वाली फ़सलें) हैं। इन्हें चावल के मुकाबले बहुत कम पानी चाहिए, ये खराब मिट्टी में भी उग जाते हैं और पोषण से भरपूर होते हैं।
ICAR ने मोटे अनाज की कई प्रजातियों के जीनोम की मैपिंग की है और उन जेनेटिक अनुक्रमों (Genetic sequences) की पहचान की है जो इन्हें इतना मज़बूत बनाते हैं। ब्रिक्स (BRICS) नेटवर्क के जरिए, भारत इस जेनेटिक ब्लूप्रिंट को साझा कर रहा है, जिससे रूस और चीन जैसे देशों को धरती के गर्म होने पर इन प्राचीन अनाजों को अपनी खाद्य सुरक्षा रणनीतियों में शामिल करने में मदद मिल रही है।
रोजमर्रा की मुख्य फ़सलों के अलावा, यह ओपन-सोर्स सीड बैंक उच्च-मूल्य वाली व्यावसायिक खेती (Commercial farming) में भी क्रांति ला रहा है। जैसे-जैसे किसान अपनी आय बढ़ाना चाहते हैं, वे बागवानी—जैसे एवोकाडो (Avocados), ड्रैगन फ्रूट और अच्छी किस्म के खट्टे फलों (Citrus) की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, इन फ़सलों को उगाने के लिए एक बहुत ही विशिष्ट और स्थिर मौसम की आवश्यकता होती थी।
आज, साझा बायोटेक्नोलॉजी के जरिए वैज्ञानिक इन महंगी फ़सलों के जेनेटिक्स में बदलाव कर पा रहे हैं। वे ऐसी बौनी किस्में (dwarf varieties) बना रहे हैं जो कम पानी पीती हैं, स्थानीय कीड़ों से लड़ सकती हैं और ग्लोबल साउथ के बदलते मौसम में भी उगाई जा सकती हैं। इससे सूखे इलाकों के छोटे किसान भी कम मुनाफे वाली पारंपरिक खेती को छोड़कर, मौसम की मार सहने वाली और ज़्यादा मुनाफ़ा देने वाली व्यावसायिक खेती अपना सकते हैं।
किसान के लिए सबसे बड़ी सीख: प्रकृति पर निर्भरता का बदलना
बारिश के इंतज़ार में सूखे आसमान की तरफ देखते एक आम किसान के लिए, इस ओपन-सोर्स जीनोम नेटवर्क के मायने बहुत गहरे हैं। यह खेती से जुड़े जोखिम की प्रकृति में एक बुनियादी बदलाव का प्रतीक है।
पिछले 10,000 सालों से किसान का सबसे बड़ा दोस्त और सबसे खूंखार दुश्मन सिर्फ ‘मौसम’ ही रहा है। एक अच्छी फ़सल पूरी तरह से मौसम की किस्मत पर निर्भर करती थी—यानी सही समय पर सही मात्रा में बारिश का होना। आज, वह निर्भरता बदल रही है। 21वीं सदी का किसान सिर्फ बारिश पर निर्भर नहीं रहेगा; वह उस वैज्ञानिक ताकत (Resilience) पर निर्भर करेगा जिसे बीज के अंदर डाला गया है।
जब किसान महाद्वीपों के बीच फैले इस बायोलॉजिकल गठबंधन से विकसित किए गए बीज की एक बोरी खरीदता है, तो वह सिर्फ एक पौधा नहीं खरीद रहा होता है। वह असल में एक सूक्ष्म (Microscopic) ‘सर्वाइवल किट’ खरीद रहा है। वह ब्राज़ील के सवाना जंगलों में परखा गया सूखापन सहने का गुण खरीद रहा है, भारत के प्राचीन अनाज से ली गई गर्मी सहने की ताकत खरीद रहा है, और चीन की प्रयोगशाला में तैयार की गई ज़्यादा पैदावार की क्षमता खरीद रहा है।
ब्रिक्स (BRICS) का यह बायोलॉजिकल नेटवर्क इस बात की गारंटी देता है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property) विकासशील देशों के हाथों में ही रहे। पेटेंट की दीवारों को तोड़कर और जेनेटिक डेटा को जीवित रहने के एक साझा हथियार के रूप में इस्तेमाल करके, ये देश यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जैसे-जैसे जलवायु बदलेगी, फ़सलें मौसम के कहर बरपाने से पहले ही खुद को ढाल लेंगी।
खेती का भविष्य अब डीएनए (DNA) की भाषा में लिखा जा रहा है, और इतिहास में पहली बार, कलम ग्लोबल साउथ के हाथों में है।
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