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क्या आपने कभी सोचा है कि अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे एक सैटेलाइट का आपके खेत की मिट्टी की नमी से क्या लेना-देना है? या फिर आसमान से मिलने वाली जानकारी कैसे तय करती है कि किसान को बीज कब बोना चाहिए? सदियों से खेती को सिर्फ जमीन और बादलों से जोड़कर देखा जाता रहा है, जहां किसान पीढ़ियों के अनुभव और मौसम के भरोसे रहता था। लेकिन आज, खेती का यह पूरा ढांचा तेजी से बदल रहा है और इसकी सीमाएं अब जमीन से पार होकर अंतरिक्ष तक पहुंच गई हैं।
हम रोज़ाना की खबरों में ब्रिक्स (BRICS – ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका, जो अब BRICS+ हो गया है) को सिर्फ डॉलर, स्थानीय मुद्रा या विदेशी कूटनीति से जोड़कर देखते हैं। लेकिन चुपचाप, ये देश खेती का एक ऐसा विशाल और आपस में जुड़ा हुआ इकोसिस्टम (ecosystem) बना रहे हैं जो दुनिया की लगभग आधी आबादी का पेट भरने वाला है। स्पेस टेक्नोलॉजी (अंतरिक्ष विज्ञान), बायोलॉजी लैब्स और डिजिटल टूल्स को एक साथ जोड़कर विकासशील देश (Global South) खेती का अपना एक स्वतंत्र और मजबूत सिस्टम तैयार कर रहे हैं।
इस बड़े और कई महाद्वीपों में फैले ऑपरेशन को ज़मीन पर समझने के लिए, हम इसे तकनीक के तीन अहम हिस्सों में बांट सकते हैं: अंतरिक्ष से निगरानी, लैब में नई खोज, और किसान के फोन पर उसका सीधा इस्तेमाल। यह तरीका बताता है कि कैसे अंतरिक्ष से मिलने वाले कच्चे डेटा को लैब में उन्नत बीजों में बदला जाता है, और अंत में किसान को अपने खेत में सही आर्थिक फैसला लेने में मदद मिलती है।
चरण 1: अंतरिक्ष से निगरानी (अपना खुद का स्पेस नेटवर्क)
आधुनिक खेती की सबसे बड़ी जरूरत है सटीक जानकारी यानी ‘डेटा’, और पूरी दुनिया की खेती का डेटा जुटाने की सबसे अच्छी जगह है—अंतरिक्ष। पहले भारत जैसे विकासशील देश मौसम की जानकारी, मिट्टी की सेहत और प्राकृतिक आपदाओं के डेटा के लिए पश्चिमी देशों की स्पेस एजेंसियों या प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर रहते थे। लेकिन ब्रिक्स देशों ने 2021 में ‘ब्रिक्स रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट कॉन्स्टलेशन’ समझौता करके इस निर्भरता को खत्म कर दिया।
यहीं से इस नए इकोसिस्टम की शुरुआत होती है। यह कोई एक नया बड़ा सैटेलाइट नहीं है जिसे हाल ही में लॉन्च किया गया हो, बल्कि यह इन देशों के पास पहले से मौजूद सैटेलाइट्स का एक साझा और स्मार्ट नेटवर्क है। इसमें भारत की ‘रिसोरसैट’ (Resourcesat) सीरीज, चीन के ‘गाओफेन’ (Gaofen), रूस का ‘कैनोपस-वी’ (Kanopus-V) और चीन-ब्राजील का साझा ‘CBERS’ सैटेलाइट शामिल है।
खेती के लिए इस साझा सैटेलाइट नेटवर्क का क्या फायदा है? जवाब इसके चक्कर लगाने के समय में छिपा है। अगर एक सैटेलाइट धरती का चक्कर लगा रहा है, तो वह भारत या ब्राजील के किसी खास खेत के ऊपर से शायद कुछ दिनों में एक ही बार गुजरेगा। अगर बीच के दिनों में अचानक भारी बारिश हो जाए या टिड्डियों का बड़ा दल आ जाए, तो उस समय का डेटा मिस हो जाता है। लेकिन अपने सैटेलाइट्स को एक साथ जोड़कर, ब्रिक्स देशों ने इस गैप को काफी कम कर दिया है। अब इन देशों के ग्राउंड स्टेशन आपस में हाई-रेज़ोल्यूशन तस्वीरें और रडार डेटा रियल-टाइम में तुरंत शेयर करते हैं।
खेती-किसानी के लिए यह लगातार मिलने वाली जानकारी किसी चमत्कार से कम नहीं है। इन सैटेलाइट्स में लगे खास सेंसर (Hyperspectral sensors) नीचे लहलहाती फसल का केमिकल मेकअप तक पढ़ सकते हैं। मिट्टी में दरारें दिखने से कई हफ्ते पहले ही ये सेंसर बता देते हैं कि सूखा पड़ने वाला है। ये जमीन के नीचे घटते पानी को माप सकते हैं, महाद्वीपों के बीच उड़ने वाले टिड्डी दलों को ट्रैक कर सकते हैं, और खेतों के बड़े हिस्से में नाइट्रोजन की सटीक मात्रा बता सकते हैं।
इस सैटेलाइट नेटवर्क ने सुनिश्चित किया है कि अब विकासशील देशों को अंधेरे में तीर नहीं चलाना पड़ेगा या किसी और देश की रिपोर्ट का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। यह निगरानी व्यवस्था लगातार काम करती है, अपनी है और बेहद सटीक है। लेकिन, अंतरिक्ष से मिलने वाला यह कच्चा डेटा सिर्फ एक बीमारी पकड़ने वाले टूल की तरह है। खाद्य सुरक्षा पक्की करने के लिए, इस डेटा को समझना और फिर जैविक समाधान में बदलना बहुत ज़रूरी है।
चरण 2: लैब में नई खोज (ओपन–सोर्स सीड बैंक और उन्नत बीज)
अगर सैटेलाइट बदलती दुनिया और मौसम का कच्चा डेटा देता है, तो लैब्स (प्रयोगशालाएं) उस बदलाव से निपटने के लिए वैज्ञानिक इनोवेशन (नई खोज) देती हैं। जब अंतरिक्ष से पता चलता है कि किसी खास खेती वाले इलाके का तापमान एक डिग्री बढ़ रहा है, या अल नीनो (El Niño) के कारण बारिश का पैटर्न खतरनाक तरीके से बदल रहा है, तो इससे निपटने का पूरा सिस्टम क्या होना चाहिए?
यहीं पर ब्रिक्स एग्रीकल्चरल रिसर्च प्लेटफॉर्म (BRICS-ARP) की एंट्री होती है, जिसमें भारत का भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) एक प्रमुख धुरी की तरह काम करता है। यह दूसरा चरण पूरी तरह से जेनेटिक्स (बीजों के डीएनए), जर्मप्लाज्म (पौधों के मूल गुण) के आदान-प्रदान और ‘क्लाइमेट-स्मार्ट बायोलॉजी’ (मौसम की मार झेल सकने वाले विज्ञान) के बारे में है।
ब्रिक्स देशों की खेती का तरीका एक-दूसरे से बहुत अलग है, लेकिन वे एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हैं। ब्राजील बड़े पैमाने पर मशीनों से खेती करने में माहिर है और उसकी सरकारी एजेंसी EMBRAPA ने अपनी फसलों को गर्म मौसम के अनुकूल बनाने में महारत हासिल की है। चीन के पास CAAS के ज़रिए बीजों के जीनोम पढ़ने (genomic sequencing) और ज्यादा पैदावार देने वाली हाइब्रिड तकनीक है। भारत, जहां छोटे किसानों की संख्या सबसे ज्यादा है, जैव विविधता, सूखे से लड़ने वाले पारंपरिक मोटे अनाजों (जैसे श्री अन्न/Millets) और खेती के विस्तार कार्यक्रमों में सबसे आगे है। वहीं रूस मिट्टी विज्ञान (soil science) और खेती लायक विशाल ज़मीन के प्रबंधन में अपना बेजोड़ अनुभव लाता है।
ब्रिक्स के इस ढांचे के तहत, ये देश अब अलग-थलग होकर रिसर्च नहीं कर रहे हैं। वे ग्लोबल साउथ के लिए एक विशाल और ‘ओपन-सोर्स’ बायोलॉजिकल डेटाबेस बना रहे हैं। जब इन देशों के वैज्ञानिक मिलकर काम करते हैं, तो वे अपने बीजों की जेनेटिक लाइब्रेरी साझा करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर ब्राजील के वैज्ञानिकों ने सोयाबीन के बीज में एक ऐसा जीन खोज लिया है जो उसे लंबे समय तक सूखे से बचाता है, तो उस वैज्ञानिक समझ को भारतीय शोधकर्ताओं के साथ साझा किया जा सकता है, ताकि वे भी भारत की तिलहन (oilseed) फसलों को मानसून की अनिश्चितता से बचा सकें।
इनोवेशन का यह चरण पूरी तरह से भविष्य की तैयारी पर केंद्रित है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तेज़ हो रहा है, गेहूं और चावल जैसी हमारी पारंपरिक फसलें बढ़ती गर्मी और पानी की कमी के आगे कमज़ोर पड़ रही हैं। ब्रिक्स का रिसर्च नेटवर्क ऐसी नई और मजबूत फसलों के जेनेटिक मैप तैयार करने में भारी निवेश कर रहा है। भुला दी गई, मौसम की मार सहने वाली पुरानी फसलों के डीएनए का अध्ययन करके और आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके, वैज्ञानिक ऐसे बीज तैयार कर रहे हैं जो सैटेलाइट डेटा द्वारा बताई गई भविष्य की कठोर परिस्थितियों में भी ज़िंदा रह सकें।
यह कोई किताबी बातें नहीं हैं; यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक बेहद ज़रूरी जैविक जंग है। ब्रिक्स के सीड बैंक और रिसर्च प्लेटफॉर्म यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहे हैं कि आज से दस साल बाद जो फसल बोई जाए, उसके डीएनए में खराब मौसम से बचने की मेमोरी (याददाश्त) पहले से मौजूद हो। अंतरिक्ष से मिले डेटा को अब सीधे बीजों के डीएनए में ढाला जा रहा है।
चरण 3: किसान के फोन पर सीधा इस्तेमाल (एग्री–स्टैक)
दुनिया का सबसे एडवांस सैटेलाइट नेटवर्क और लैब में तैयार किए गए सबसे मजबूत बीज तब तक किसी काम के नहीं हैं, जब तक वे आम किसान के हाथों तक नहीं पहुंचते। इस पूरे इकोसिस्टम का आखिरी, और शायद सबसे महत्वपूर्ण चरण है—जमीन पर इसका सीधा इस्तेमाल।
इतिहास गवाह है कि बड़े पैमाने पर होने वाली कृषि विज्ञान की रिसर्च और ज़मीन पर किसान की रोज़मर्रा की खेती के बीच हमेशा एक बड़ी खाई रही है। ब्रिक्स का यह नया ढांचा, जो भारत के ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ (DPI) यानी ‘एग्री-स्टैक’ (Agri-Stack) की पहल से काफी प्रभावित है, इस खाई को पाट रहा है।
आम किसान विज्ञान के इस इतने बड़े काम का इस्तेमाल कैसे करता है? अंतरिक्ष से मिले डेटा और लैब के इनोवेशन का पूरा निचोड़ उसे सीधे अपने स्मार्टफोन पर मिलता है। यह एग्री-स्टैक सिस्टम किसान की डिजिटल पहचान, डिजिटल ज़मीन के रिकॉर्ड और स्थानीय मौसम के डेटा को मिलाकर हर किसान के लिए एकदम सटीक और व्यक्तिगत सलाह (personalized advisory) तैयार करता है।
ज़रा सोचिए कि एक छोटा किसान बुवाई के सीज़न की तैयारी कर रहा है। पूरे राज्य के लिए जारी होने वाले किसी सामान्य मौसम पूर्वानुमान के भरोसे रहने के बजाय, किसान के फोन पर एक खास अलर्ट आता है। यह अलर्ट ब्रिक्स सैटेलाइट नेटवर्क की मदद से भेजा गया है, जिसने नमी के पैटर्न को देखकर बता दिया है कि इस बार मानसून देर से आएगा। उसी समय, डिजिटल ऐप (जो रिसर्च लैब्स के डेटा से जुड़ा है) किसान को सलाह देता है कि वह अपनी पुरानी किस्म के बीजों की बुवाई 10 दिन टाल दे, या फिर उसे एक ऐसी नई किस्म की फसल बोने की सलाह देता है जो जल्दी तैयार हो जाती है और जिसे 30% कम पानी की ज़रूरत होती है।
यह ऐप सिर्फ बुवाई तक सीमित नहीं है। यह संसाधनों के सही इस्तेमाल का भी रास्ता बताता है। सैटेलाइट द्वारा मैप किए गए ‘सॉइल हेल्थ कार्ड’ का इस्तेमाल करके, किसान को ठीक-ठीक पता होता है कि उसके दो एकड़ खेत के किस हिस्से में नाइट्रोजन डालना है और किस हिस्से में फॉस्फोरस की कमी है। इस ‘प्रिसिजन एग्रीकल्चर’ (सटीक खेती) का फायदा पहले सिर्फ पश्चिमी देशों के बड़े कॉरपोरेट खेतों को मिलता था, लेकिन अब ब्रिक्स की डिजिटल एग्रीकल्चर पहल के ज़रिए यह सस्ते डिजिटल टूल्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर और ड्रोन-स्प्रे तकनीक के रूप में छोटे किसानों तक पहुंच रहा है।
इतना ही नहीं, यह बुनियादी ढांचा फसल की कटाई और उसे बेचने के अर्थशास्त्र (economics) को भी मजबूत करता है। दुनिया भर में पैदावार के डेटा और स्थानीय बाजार की मांग को समझकर, डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों को सलाह दे सकते हैं कि फसल काटने और मंडी में बेचने का सही समय क्या है। ब्रिक्स देश अब प्रस्तावित ‘ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज’ (BRICS Grain Exchange) जैसे सिस्टम की तरफ बढ़ रहे हैं। इसका लक्ष्य स्थानीय किसानों को बाजार में अचानक दाम गिरने या पश्चिमी देशों के कमोडिटी मार्केट (जैसे शिकागो बोर्ड) के भारी उतार-चढ़ाव से बचाना है, ताकि उन्हें एक स्थिर आर्थिक माहौल मिल सके। किसान अब प्रकृति के भरोसे बैठा एक असहाय दर्शक नहीं है; वह डेटा से लैस एक सक्रिय निर्णय लेने वाला व्यक्ति बन गया है।
खाद्य सुरक्षा की राजनीति और खेती की नई सच्चाई
इस ‘बीज से सैटेलाइट’ मॉडल को समझने के बाद यह साफ हो जाता है कि ब्रिक्स का कृषि एजेंडा सिर्फ किसी कूटनीतिक बैठक या संयुक्त घोषणापत्र से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह पूरी दुनिया की खाद्य व्यवस्था को जड़ से बदलने की तैयारी है।
सदियों से, विकासशील देश बाहरी दुनिया के झटकों के प्रति बहुत संवेदनशील रहे हैं। चाहे वह अंतरराष्ट्रीय फर्टिलाइजर (खाद) की कीमतों में उछाल हो, विदेशी सट्टेबाजों द्वारा अचानक अनाज के दाम बदल देना हो, या फिर पश्चिमी देशों द्वारा तकनीक के निर्यात पर रोक लगाना हो—विकासशील देशों को हमेशा इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
‘अंतरिक्ष से निगरानी, लैब में नई खोज, और किसान के फोन पर सीधा इस्तेमाल’ का यह मिला-जुला इकोसिस्टम इन बाहरी झटकों के खिलाफ एक मजबूत ढाल का काम करता है। अपनी खुद की सैटेलाइट क्षमता बनाकर, ये देश धरती के डेटा पर एकाधिकार को तोड़ रहे हैं। अपनी रिसर्च को एक साथ जोड़कर, वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि भविष्य के बीजों का अधिकार विकासशील देशों के पास ही रहे। और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर लागू करके, वे इस बात की गारंटी दे रहे हैं कि इस तकनीक का सीधा फायदा सबसे गरीब किसान तक पहुंचे।
ब्रिक्स का ‘BRICS+’ में विस्तार इस इकोसिस्टम को और भी मज़बूती देता है। मिस्र (दुनिया के सबसे बड़े अनाज आयातकों में से एक), इथियोपिया (खेती पर निर्भर अर्थव्यवस्था), और संयुक्त अरब अमीरात (जिसके पास एग्री-टेक में निवेश के लिए भारी पूंजी है) जैसे देशों के जुड़ने से डेटा, साइंस और पूंजी का यह नेटवर्क गहराई से आपस में जुड़ रहा है।
किसान के लिए सबसे बड़ी सीख
खेती-किसानी से जुड़े समुदाय के लिए, यह कहानी बिल्कुल साफ और एवरग्रीन है: खेती अब सिर्फ मिट्टी जोतने का काम नहीं रह गई है। यह अब स्पेस साइंस (अंतरिक्ष विज्ञान), एडवांस्ड जेनेटिक्स और रियल-टाइम डेटा का मिला-जुला रूप है।
किसान की वो पुरानी तस्वीर, जिसमें उसे तकनीक से कटा हुआ माना जाता था, अब बदल चुकी है। ब्रिक्स के इस नए एग्री-इकोसिस्टम में किसान एक विशाल, अदृश्य नेटवर्क का केंद्र है। आज जब एक किसान अपने खेत में खड़ा होकर डिजिटल ऐप देखता है, तो वह असल में अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक बायोलॉजी के संगम पर खड़ा होता है।
वह आसमान से मिलने वाले निगरानी डेटा का इस्तेमाल कर रहा है, लैब में तैयार किए गए इनोवेटिव बीज बो रहा है, और खेती की ऐसी रणनीति अपना रहा है जो न सिर्फ उसकी अपनी आजीविका सुरक्षित करती है, बल्कि दुनिया की आधी आबादी का पेट भरने में भी अहम भूमिका निभाती है। 21वीं सदी में दुनिया की खेती की यही नई सच्चाई है।
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।
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