उत्तर प्रदेश के किसान अब बैंगन की खेती को नई तकनीक से कर रहे हैं। वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) ने चंदौली में किसानों को 2200 ग्राफ्टेड (कलमी) बैंगन के पौधे वितरित किए। यह कदम किसानों की आमदनी बढ़ाने और फसल को बीमारियों से बचाने के लिए बहुत अहम है।
क्या है ग्राफ्टिंग तकनीक
एकीकृत बागवानी विकास मिशन (Mission for Integrated Development of Horticulture) के तहत ये कार्यक्रम आयोजित हुआ। ग्राफ्टिंग तकनीक से पौधे मिट्टी में होने वाली बीमारियों और सूखे या ज़्यादा पानी जैसी परेशानियों को सहन करने में सक्षम हो जाते हैं। इससे उत्पादन के साथ क्वालिटी भी अच्छी रहती है, वहीं लागत में भी कम आती है।
पौधे की रोपाई करते वक्त इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाता है कि पौधे का जोड़ (ग्राफ्ट यूनियन) मिट्टी के कॉन्टेक्ट में न हो। तो पौधे को रोग प्रतिरोधक क्षमता का पूरा फायदा नहीं मिल पाता। साथ ही सिंचाई, पोषण और नियमित निगरानी के बारे में भी विस्तार से बताया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,संस्थान के निदेशक राजेश कुमार ने इस फसल की ख़ासियत बताई। उनके अनुसार, ये ग्राफ्टेड बैंगन रोपाई के 45 दिनों बाद ही पहली तुड़ाई देने लगता है। इसके बाद हर हफ्ते दो बार इसकी तुड़ाई की जा सकती है।
सही देखभाल और पोषण
सबसे अच्छी बात यह है कि अगर किसान सही देखभाल और पोषण दें, तो यह फसल लगातार 6 से 8 महीने तक उत्पादन देती है। यानी किसानों को बार-बार नई फसल नहीं लगानी पड़ती और कई महीनों तक उनकी कमाई का सिलसिला बना रहता है।
बता दें कि ये पहल किसानों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है। अब वे पारंपरिक खेती को छोड़कर वैज्ञानिक और मॉडर्न तरीकों से न सिर्फ अच्छी पैदावार ले सकते हैं, बल्कि अपनी आमदनी को भी कई गुना बढ़ा सकते हैं। ग्राफ्टेड तकनीक अपनाकर किसान खेती को मुनाफे का धंधा बना सकते हैं।
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